शैलेन्द्र तिवारी। उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने संगठन में बड़ा दांव चला है। पार्टी ने राष्ट्रीय महामंत्री विनोद तावड़े को यूपी का प्रभारी बनाया है। उनके साथ गुजरात के जगदीश ईश्वरभाई पटेल को सह-प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है। यह नियुक्ति ऐसे समय हुई है, जब भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी को तेज कर रही है।
तावड़े ही क्यों? संगठन और चुनाव मैनेजमेंट का लंबा अनुभव
विनोद तावड़े की सबसे बड़ी ताकत उनका संगठन और चुनावी मैनेजमेंट का अनुभव माना जाता है। महाराष्ट्र की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय संगठन में पहुंचे तावड़े पहले हरियाणा और फिर बिहार के प्रभारी रह चुके हैं। 2020 में उन्हें हरियाणा की जिम्मेदारी दी गई थी। 2022 में उन्हें हरियाणा से हटाकर बिहार का प्रभारी बनाया गया। बिहार में उन्हें उस समय जिम्मेदारी मिली थी, जब भाजपा को संगठनात्मक स्तर पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। वहां उनका काम सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं था, बल्कि प्रदेश संगठन और केंद्रीय नेतृत्व के बीच बेहतर तालमेल बनाने का भी था। 2024 में भी भाजपा ने उन्हें बिहार का प्रभारी बनाए रखा।
बिहार की सफलता बनी यूपी में तावड़े की सबसे बड़ी पूंजी
तावड़े के पक्ष में सबसे बड़ा फैक्टर बिहार का चुनावी अनुभव है। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा-एनडीए के प्रदर्शन के बाद उनकी संगठनात्मक क्षमता को लेकर पार्टी के भीतर उनकी स्थिति और मजबूत हुई। इसके बाद 2026 में केरल के चुनावी अभियान में भी उन्हें महत्वपूर्ण भूमिका दी गई। केरल की रिपोर्टों में भाजपा नेताओं ने बिहार और हरियाणा के चुनावी अनुभव को उनकी जिम्मेदारी दिए जाने की वजहों में गिना। यानी भाजपा ने यूपी में ऐसे नेता को उतारा है, जिसके पास चुनाव से पहले संगठन को सक्रिय करने, बूथ स्तर तक नेटवर्क बनाने और अलग-अलग सामाजिक समीकरणों के बीच तालमेल बैठाने का अनुभव है।
हरियाणा से बिहार और अब यूपी
तावड़े का प्रभारी के तौर पर ट्रैक रिकॉर्ड देखें तो तीन पड़ाव खास हैं।
हरियाणा: 2020 में राष्ट्रीय सचिव रहते हुए उन्हें हरियाणा की जिम्मेदारी मिली थी।
बिहार: 2022 में उन्हें बिहार का प्रभारी बनाया गया। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी वह बिहार के चुनाव प्रभारी रहे।
केरल: 2026 के विधानसभा चुनाव के दौरान तावड़े को केरल में चुनावी अभियान और संगठनात्मक तैयारियों में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई। अब उत्तर प्रदेश उनके सामने सबसे बड़ा संगठनात्मक टास्क है।
यूपी 2027 के लिए BJP का प्लान क्या?
1. 2024 लोकसभा की कमी 2027 में पूरी करने की कोशिश
2024 लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा के प्रदर्शन ने पार्टी के सामने संगठन को नए सिरे से मजबूत करने की चुनौती खड़ी की थी। ऐसे में 2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए केवल सत्ता बरकरार रखने का चुनाव नहीं, बल्कि 2024 के नुकसान की भरपाई का मौका भी है। विश्लेषणों में यूपी को भाजपा के लिए 2027 का सबसे महत्वपूर्ण चुनावी मैदान माना जा रहा है।
2. बूथ से लेकर विधानसभा तक संगठन की समीक्षा
तावड़े के सामने सबसे बड़ा काम प्रदेश संगठन को चुनावी मोड में लाना होगा। इसमें बूथ समितियों की सक्रियता, पन्ना स्तर का नेटवर्क, कमजोर बूथों की पहचान और विधानसभा क्षेत्रवार रणनीति प्रमुख हो सकती है।
3. जातीय और सामाजिक समीकरण पर फोकस
भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में यूपी से कई नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं। इनमें स्मृति ईरानी और हरीश द्विवेदी को राष्ट्रीय महामंत्री, रेखा वर्मा और प्रो. तारिक मंसूर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तथा अन्य नेताओं को राष्ट्रीय जिम्मेदारियां मिली हैं। इससे संकेत मिलता है कि पार्टी संगठन के साथ सामाजिक प्रतिनिधित्व का संतुलन भी साधना चाहती है।
4. सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल
यूपी जैसे बड़े राज्य में सरकार और संगठन के बीच तालमेल चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा होता है। तावड़े का संगठनात्मक अनुभव यहां काम आ सकता है। उनकी भूमिका सरकार के कामकाज से ज्यादा पार्टी संगठन, चुनावी तैयारी और केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति को जमीन तक पहुंचाने की होगी।
5. 2029 की तैयारी भी साथ-साथ
2027 का यूपी चुनाव भाजपा के लिए सिर्फ विधानसभा की लड़ाई नहीं है। यूपी लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटों वाला राज्य है। इसलिए 2027 में मजबूत संगठन खड़ा करना भाजपा के 2029 लोकसभा मिशन की भी तैयारी माना जा रहा है। भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम के गठन को भी 2027 विधानसभा चुनावों और 2029 लोकसभा चुनाव की तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है।
तावड़े के सामने तीन बड़ी चुनौतियां
पहली: संगठन में तालमेल – अलग-अलग स्तर पर मौजूद गुटों और नेताओं के बीच बेहतर समन्वय।
दूसरी: कमजोर सीटों की पहचान – 2024 के लोकसभा परिणामों के आधार पर उन विधानसभा क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करना जहां भाजपा कमजोर रही।
तीसरी: वोटर कनेक्ट – सरकार की योजनाओं और पार्टी के एजेंडे को बूथ स्तर तक पहुंचाना और अलग-अलग सामाजिक वर्गों के बीच पकड़ मजबूत करना।

