America Iran Tension: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने की कोशिशों को एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। जून में वर्साय में दोनों देशों के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत स्थायी समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के लिए 60 दिनों की समय-सीमा तय की गई थी। यह अवधि सोमवार को समाप्त हो गई, लेकिन इस दौरान न तो कोई स्थायी समझौता हो सका और न ही दोनों देशों के बीच भरोसा कायम हो पाया। हालात अब ऐसे हैं कि बातचीत के बजाय सैन्य टकराव की आशंका फिर मजबूत होती दिखाई दे रही है।
60 दिन की कोशिश, लेकिन नहीं निकला समाधान
जून में हुए समझौते का उद्देश्य सैन्य गतिविधियों को रोकना, युद्ध को स्थायी रूप से समाप्त करने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद का समाधान तलाशना था। उम्मीद थी कि 60 दिनों के भीतर दोनों पक्ष किसी व्यापक समझौते की ओर बढ़ेंगे। लेकिन कुछ ही समय बाद बातचीत का सिलसिला रुक गया और दोनों देशों के बीच फिर सैन्य कार्रवाई शुरू हो गई। इसके बाद समझौते की शर्तों को लेकर अमेरिका और ईरान एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे।
हमलों ने बिगाड़े हालात
समझौते के कुछ ही समय बाद तनाव उस वक्त और बढ़ गया, जब ईरान की ओर से ओमान के तट के पास समुद्री रास्ते से गुजर रहे जहाजों पर गोलीबारी की घटना सामने आई। यह क्षेत्र होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास के रणनीतिक समुद्री मार्ग से जुड़ा है, जहां अमेरिकी सैन्य मौजूदगी भी रहती है। इसके जवाब में अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की। इसके बाद ईरान ने अरब देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को मिसाइलों से निशाना बनाया। इन घटनाओं ने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव को और गहरा कर दिया।
बातचीत को लेकर दोनों के दावे अलग
मौजूदा स्थिति में अमेरिका और ईरान के बयानों में भी बड़ा अंतर नजर आ रहा है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने जून में ही अमेरिका के साथ सीधी बातचीत बंद कर दी थी। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार बातचीत जारी रहने का दावा करते रहे हैं। ट्रंप कई बार ईरान के खिलाफ बड़े हमले की चेतावनी भी दे चुके हैं और साथ ही बातचीत में प्रगति होने की बात कहते रहे हैं। ऐसे विरोधाभासी दावों के बीच किसी ठोस समझौते की संभावना फिलहाल कमजोर नजर आ रही है।
पाकिस्तान की मध्यस्थता पर भी नजर
जून में हुए समझौते को आगे बढ़ाने में पाकिस्तान की भूमिका महत्वपूर्ण मानी गई थी। पाकिस्तान ने हाल ही में कहा कि 60 दिन की समय-सीमा खत्म होने के बावजूद वह बातचीत का रास्ता बंद नहीं मानता। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी के मुताबिक, उनका देश दोनों पक्षों को फिर बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि जमीनी हालात और बढ़ता सैन्य तनाव इस प्रयास के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
होर्मुज पर टकराव बढ़ा सकता है तनाव
इस पूरे विवाद में होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक बनकर उभरा है। ईरान ने इस समुद्री मार्ग को फिर से खोलने के लिए अपनी मांगों की सूची सामने रखी है और ओमान के साथ इसे लेकर समझौता भी किया है। दूसरी ओर अमेरिका ने ईरान की मांगों को स्वीकार नहीं किया है। ऐसे में परमाणु कार्यक्रम, समुद्री मार्ग और सैन्य कार्रवाई जैसे मुद्दों पर मतभेद बरकरार हैं। 60 दिन की समय-सीमा खत्म होने के बाद अगर कूटनीतिक प्रयास विफल होते हैं, तो पश्चिम एशिया में तनाव और सैन्य टकराव बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

