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UCC पर सुप्रीम कोर्ट की 4 दशक पुरानी चिंता, शाह के 2029 के पहले लागू करने वाले बयान ने बढ़ाई सियासी हलचल

UCC पर सुप्रीम कोर्ट की 4 दशक पुरानी चिंता, शाह के 2029 के पहले लागू करने वाले बयान ने बढ़ाई सियासी हलचल

समान नागरिक संहिता यानी Uniform Civil Code (UCC) एक बार फिर देश की राजनीति और संवैधानिक बहस के केंद्र में है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान के बाद यह मुद्दा तेजी से चर्चा में आया है, जिसमें उन्होंने कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा-एनडीए शासित 21 राज्यों में UCC लागू कर दिया जाएगा। शाह ने यह भी कहा कि तीन तलाक खत्म कर मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार देने की दिशा में कदम उठाए गए हैं और कई राज्यों में UCC लागू हो चुका है।

लेकिन इस घोषणा के बाद बिहार में एनडीए की सहयोगी जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने साफ संकेत दिया है कि राज्य में UCC को लेकर उसकी सहमति नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर UCC ऐसा मुद्दा क्यों है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट पिछले चार दशकों से सरकारों का ध्यान खींचता रहा है? और जब अदालत बार-बार इसकी जरूरत का उल्लेख कर चुकी है तो अब तक देशभर में इसे लागू क्यों नहीं किया जा सका?

UCC आखिर है क्या, जिसे लेकर होती है बहस?
समान नागरिक संहिता का सीधा अर्थ है कि देश के नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने और परिवार से जुड़े दूसरे नागरिक मामलों में धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय एक समान कानूनी व्यवस्था हो। भारत में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के निजी मामलों को नियंत्रित करने के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ मौजूद हैं। UCC की अवधारणा इसी व्यवस्था के स्थान पर समान नागरिक कानून की बात करती है।

इसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 44 है। यह संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों का हिस्सा है, मौलिक अधिकार नहीं। इसलिए कोई नागरिक केवल अनुच्छेद 44 के आधार पर अदालत में जाकर UCC लागू करने की मांग को मौलिक अधिकार की तरह लागू नहीं करा सकता। इसे लागू करने के लिए कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद या संबंधित राज्य विधानसभाओं की होती है। यहीं से UCC की संवैधानिक यात्रा और राजनीतिक पेचीदगी दोनों शुरू होती हैं।

1985 में शाह बानो केस से शुरू हुई संवैधानिक बहस
UCC को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चर्चित टिप्पणियों में सबसे अहम पड़ाव शाह बानो मामला रहा। 1985 में सुप्रीम कोर्ट के सामने मुस्लिम महिला के गुजारा भत्ता यानी मेंटेनेंस का सवाल था। फैसले के दौरान अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 44 का उल्लेख करते हुए इस बात पर चिंता जताई कि समान नागरिक संहिता से जुड़ा संवैधानिक प्रावधान अब तक प्रभावी नहीं हो पाया है। अदालत का तर्क था कि अलग-अलग पर्सनल लॉ से पैदा होने वाले विरोधाभासों को दूर करने और राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में UCC उपयोगी हो सकता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट रखा कि समान नागरिक संहिता बनाना अदालत का नहीं, बल्कि विधायिका का काम है।

शाह बानो फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि इसके बाद UCC सिर्फ संविधान के एक नीति-निर्देशक प्रावधान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़े मुद्दे के तौर पर उभर आया।

सरला मुद्गल केस
शाह बानो मामले के लगभग एक दशक बाद सरला मुद्गल बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फिर UCC का मुद्दा उठाया। इस मामले में सवाल यह था कि क्या कोई हिंदू पुरुष अपनी पहली शादी समाप्त किए बिना दूसरी शादी करने के लिए इस्लाम स्वीकार कर सकता है। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने विवाह और उत्तराधिकार जैसे विषयों को मूल रूप से धर्मनिरपेक्ष प्रकृति का बताया।

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर संविधान के अनुच्छेद 44 की ओर ध्यान दिलाया और केंद्र सरकार से समान नागरिक संहिता की दिशा में गंभीरता से विचार करने की बात कही। इस फैसले ने यह सवाल और बड़ा कर दिया कि जब संविधान में समान नागरिक संहिता का लक्ष्य पहले से मौजूद है और अदालत भी समय-समय पर उसकी ओर संकेत कर रही है, तो सरकारें इस दिशा में निर्णायक कदम क्यों नहीं उठा रही हैं?

2003 का जॉन वल्लमट्टम केस: उत्तराधिकार कानून
साल 2003 में जॉन वल्लमट्टम बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने ईसाई समुदाय से जुड़े उत्तराधिकार कानून का एक प्रावधान आया। इस मामले में भी अदालत ने विवाह और उत्तराधिकार जैसे विषयों को धर्मनिरपेक्ष प्रकृति का माना और अनुच्छेद 44 का उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिलाया कि संविधान में UCC का लक्ष्य मौजूद होने के बावजूद इसे अब तक लागू नहीं किया गया है। अदालत के अनुसार समान नागरिक संहिता राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में भी भूमिका निभा सकती है। इस मामले के बाद भी केंद्र सरकार ने तत्काल देशव्यापी UCC लागू करने की दिशा में कदम नहीं उठाया।

दिलचस्प बात यह है कि 2007 में संसद में केंद्र सरकार की ओर से दिए गए जवाब में सुप्रीम कोर्ट की UCC संबंधी टिप्पणियों का उल्लेख किया गया था। सरकार ने साथ ही यह भी कहा था कि अल्पसंख्यक समुदायों के पर्सनल लॉ में बदलाव के मामले में उसकी नीति संबंधित समुदायों की ओर से पर्याप्त पहल आने तक हस्तक्षेप नहीं करने की रही है।

2019: गोवा का उदाहरण देकर सुप्रीम कोर्ट ने फिर जताई चिंता
UCC को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का अगला बड़ा पड़ाव जोस पाउलो कुटिन्हो बनाम मारिया लुइजा वेलेंटीना परेरा मामला रहा। साल 2019 में सामने आए इस मामले में गोवा के उत्तराधिकार कानून से जुड़ा विवाद था। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संविधान निर्माताओं की उस अपेक्षा की ओर ध्यान दिलाया, जिसमें पूरे देश के लिए समान नागरिक संहिता की परिकल्पना की गई थी।

अदालत ने यह भी कहा कि 1956 में हिंदू पर्सनल लॉ को कोडिफाई किया गया, लेकिन सभी नागरिकों पर लागू होने वाली समान नागरिक संहिता की दिशा में वैसी व्यापक पहल नहीं हुई। इस फैसले में गोवा को समान नागरिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना गया। गोवा में धर्म से परे नागरिक मामलों को लेकर समानता वाले कई प्रावधान लंबे समय से लागू हैं। यानी 2019 तक सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को देखें तो चार दशकों से ज्यादा समय बीतने के बावजूद अनुच्छेद 44 का लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हुआ था।

2026: फिर उठा सवाल, महिलाओं के समान अधिकार पर कोर्ट की टिप्पणी
अब मामला 2026 तक पहुंचता है। मार्च 2026 में मुस्लिम महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान तत्कालीन चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के सामने UCC का मुद्दा फिर आया। सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से यह टिप्पणी सामने आई कि महिलाओं को समान अधिकार सुनिश्चित करने के लिए समान नागरिक संहिता एक प्रभावी रास्ता हो सकती है। व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद कथित लैंगिक असमानताओं से निपटने के संदर्भ में भी UCC की उपयोगिता पर चर्चा हुई।

हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणी को अंतिम फैसला या देश में UCC लागू करने का न्यायिक आदेश नहीं माना जा सकता। अदालत का रुख लगातार यही रहा है कि UCC बनाने और लागू करने का अधिकार विधायिका के पास है। सुप्रीम कोर्ट सरकार और संसद को संवैधानिक लक्ष्य की याद दिला सकता है, लेकिन खुद समान नागरिक संहिता बनाकर लागू नहीं कर सकता।

बीते चार दशक, UCC पर फैसला जस का तस
यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम सवाल है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में विवाह, तलाक, विरासत और परिवार से जुड़े नियम केवल कानूनी प्रावधान नहीं हैं। इनका संबंध धार्मिक विश्वास, सामाजिक परंपराओं और समुदायों की पहचान से भी जुड़ा है। इसलिए किसी भी सरकार के सामने चुनौती कानून तैयार करने के साथ उस कानून को लेकर व्यापक सामाजिक और राजनीतिक सहमति बनाने की भी है।

धार्मिक स्वतंत्रता और पर्सनल लॉ की चिंता
अल्पसंख्यक समुदायों के एक वर्ग में यह आशंका रही है कि समान नागरिक संहिता के नाम पर उनके धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप हो सकता है। इसी कारण अलग-अलग सरकारें इस मुद्दे पर आगे बढ़ते समय राजनीतिक और सामाजिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखती रही हैं। 2007 में केंद्र सरकार का संसदीय जवाब भी इसी सावधानी को दर्शाता था।

UCC का वास्तविक मॉडल क्या होगा?
दूसरी बड़ी चुनौती यह है कि समान नागरिक संहिता का स्वरूप आखिर कैसा होगा। क्या सभी धर्मों के मौजूदा कानूनों को मिलाकर एक नया कानून बनाया जाएगा? विवाह की उम्र, तलाक के आधार, संपत्ति में हिस्सेदारी, गोद लेने के नियम और उत्तराधिकार की व्यवस्था किस आधार पर तय होगी? इन सवालों के जवाब सिर्फ राजनीतिक घोषणा से नहीं मिल सकते। इनके लिए व्यापक कानूनी अध्ययन, सामाजिक विमर्श और विधायी प्रक्रिया की जरूरत होगी।

राजनीतिक सहमति भी बड़ी चुनौती
UCC लंबे समय से भाजपा के प्रमुख वैचारिक मुद्दों में रहा है। लेकिन एनडीए के भीतर भी सभी सहयोगी दलों का रुख एक जैसा नहीं है। बिहार में JDU की असहमति ने इस अंतर को एक बार फिर सामने ला दिया है। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि अगर 2029 तक 21 एनडीए शासित राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य है, तो क्या सभी राज्यों में राजनीतिक सहमति बन पाएगी?

अब UCC पर क्यों बढ़ी है हलचल?
पिछले कुछ वर्षों में UCC की बहस सिर्फ अदालतों और राजनीतिक घोषणाओं तक सीमित नहीं रही। कुछ राज्यों ने इसे कानून का रूप देना शुरू किया है। उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना जिसने समान नागरिक संहिता लागू की। इसके बाद अन्य भाजपा शासित राज्यों में भी UCC की दिशा में पहल और चर्चा तेज हुई है। गुजरात और असम ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं, जबकि मध्य प्रदेश में भी UCC को लेकर प्रक्रिया आगे बढ़ी है। इस राज्यवार मॉडल ने देशव्यापी बहस को नई गति दी है।

अब केंद्र सरकार के स्तर पर यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या अलग-अलग राज्यों में शुरू हुई पहल को एक व्यापक राष्ट्रीय कानून की दिशा में ले जाया जाएगा या राज्यों को अपने-अपने सामाजिक और कानूनी संदर्भ के मुताबिक आगे बढ़ने दिया जाएगा।

2029 का लक्ष्य कितना बड़ा है?
अमित शाह का 2029 से पहले भाजपा-एनडीए शासित 21 राज्यों में UCC लागू करने का दावा इस मुद्दे को सीधे अगले लोकसभा चुनाव की राजनीति से जोड़ देता है। इस घोषणा का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि UCC अब केवल भविष्य की संवैधानिक बहस नहीं रह गया है। कुछ राज्यों में इसके जरिए कानून और प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव शुरू हो चुका है।

लेकिन देशव्यापी स्तर पर तस्वीर कहीं ज्यादा जटिल है। केंद्र और राज्यों के बीच अधिकार क्षेत्र, अलग-अलग समुदायों की आपत्तियां, राजनीतिक सहयोगियों की राय और कानून के वास्तविक स्वरूप जैसे सवाल अभी भी सामने हैं।

सुप्रीम कोर्ट से सरकारों तक पहुंची चार दशक पुरानी बहस
1985 के शाह बानो मामले से लेकर 1995 के सरला मुद्गल केस, 2003 के जॉन वल्लमट्टम मामले और 2019 के जोस पाउलो कुटिन्हो केस तक सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग संदर्भों में अनुच्छेद 44 और समान नागरिक संहिता का उल्लेख किया। 2026 में महिलाओं के समान अधिकारों से जुड़ी सुनवाई के दौरान भी UCC की चर्चा सामने आई।

इन सभी घटनाक्रमों को एक साथ देखें तो तस्वीर यह बनती है कि सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर UCC की संवैधानिक परिकल्पना और संभावित उपयोगिता की ओर सरकारों का ध्यान खींचा है, लेकिन इसे कानून में बदलने की जिम्मेदारी हमेशा विधायिका की रही है। अब अमित शाह के 2029 वाले लक्ष्य और कई राज्यों में चल रही पहल ने इस चार दशक पुरानी बहस को एक नए राजनीतिक मोड़ पर ला खड़ा किया है।

आने वाले समय में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या UCC पर राजनीतिक घोषणा ही होती रहेगी या देश के अलग-अलग समुदायों और राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाकर इसे वास्तव में व्यापक कानूनी व्यवस्था का रूप दिया जा सकेगा? यही तय करेगा कि संविधान के अनुच्छेद 44 में दशकों पहले लिखा गया लक्ष्य आने वाले वर्षों में कितना आगे बढ़ता है।

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