यूजीसी एक्ट को लेकर जारी विवाद अब राजनीतिक बहस का रूप लेता जा रहा है। अलग-अलग संगठनों और वर्गों की ओर से इस मुद्दे पर प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। इसी बीच किसान नेता राकेश टिकैत ने भी यूजीसी एक्ट को लेकर बीजेपी सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने आशंका जताई कि इस तरह के प्रावधान समाज में जातिगत तनाव को बढ़ावा दे सकते हैं।
टिकैत ने आरोप लगाया कि सरकार देश को जातिवाद, धर्मवाद और मुकदमेबाजी के रास्ते पर ले जाना चाहती है। उनका कहना है कि ऐसे फैसलों का असर तत्काल भले दिखाई न दे, लेकिन आने वाले समय में इसके सामाजिक परिणाम सामने आ सकते हैं।
टिकैत बोले- बढ़ सकती है जातिगत दुश्मनी
राकेश टिकैत ने यूजीसी एक्ट पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि ऐसे प्रावधान समाज में पहले से मौजूद जातिगत खाई को और गहरा कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यवस्था का ऐसा प्रभाव नहीं होना चाहिए जिससे अलग-अलग समुदायों के बीच टकराव बढ़े।
किसान नेता के मुताबिक, इस तरह के मुद्दों का वास्तविक परिणाम आने वाला समय ही बताएगा। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब समाज में पहले से कई तरह की चुनौतियां मौजूद हैं, तो नए विवाद खड़े करने की जरूरत क्यों महसूस की जा रही है।
OBC को लेकर भी जताई चिंता
टिकैत ने हाल में सामने आई जानकारी का हवाला देते हुए कहा कि ओबीसी वर्ग को भी एससी-एसटी से जुड़े कानूनी प्रावधानों की तरह शामिल किए जाने की बात कही जा रही है। उन्होंने आशंका जताई कि यदि ऐसा होता है तो इससे सामाजिक टकराव और मुकदमों की संख्या बढ़ सकती है।
हालांकि, उनके बयान में इस संबंध में किसी आधिकारिक अधिनियम या अधिसूचना का विस्तृत उल्लेख नहीं किया गया। ऐसे में इस दावे से जुड़े प्रावधानों की आधिकारिक स्थिति अलग से स्पष्ट होना जरूरी है।
किसान संगठन को जाति में बांट रही सरकार
राकेश टिकैत ने अपने संगठन की भूमिका स्पष्ट करते हुए कहा कि उनका किसान संगठन जातिगत राजनीति से दूर रहना चाहता है। उन्होंने कहा कि किसानों को जातियों के आधार पर बांटने के बजाय उनकी समस्याओं और अधिकारों पर बात होनी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग जाति के आधार पर संगठन चलाते हैं, उन्हें ही इस तरह के मुद्दों पर जवाब देना चाहिए। टिकैत का यह बयान ऐसे समय आया है जब यूजीसी एक्ट को लेकर विभिन्न वर्गों और संगठनों के बीच बहस तेज होती जा रही है।
यूजीसी एक्ट को लेकर क्यों मचा विवाद?
यूजीसी एक्ट को लेकर देशभर में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ संगठनों की ओर से इसके प्रावधानों को लेकर आपत्ति जताई जा रही है और इसे सामाजिक विभाजन से जोड़कर देखा जा रहा है। दूसरी ओर, इस मुद्दे पर राजनीतिक दल भी अपने-अपने रुख सामने रख रहे हैं।

