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Mirzapur The Movie Review: वही भौकाल, पुराने किरदार और नई कहानी ने मचाया बवंडर….पर खिंच गई कहानी

Mirzapur The Movie Review: वही भौकाल, पुराने किरदार और नई कहानी ने मचाया बवंडर….पर खिंच गई कहानी

Mirzapur The Movie: मिर्जापुर की दुनिया को बड़े पर्दे पर देखने का इंतजार कर रहे फैंस के लिए आखिरकार मौका आ गया है। वेब सीरीज ने जिस क्राइम, पॉलिटिक्स, बदले और सत्ता की दुनिया से दर्शकों को जोड़ा था, वही दुनिया अब फिल्म के रूप में थिएटर तक पहुंच चुकी है। लेकिन फिल्म शुरू होने से पहले सबसे बड़ा सवाल यही था कि जब किरदार वही हैं, माहौल वही है और मिर्जापुर की गद्दी की लड़ाई भी वही है, तो आखिर इस फिल्म में नया क्या देखने को मिलेगा?

फिल्म देखने के बाद इस सवाल का जवाब काफी हद तक साफ हो जाता है। मेकर्स ने सीरीज को दोहराने की कोशिश नहीं की है। उन्होंने उसी दुनिया को आधार बनाकर एक नई कहानी गढ़ी है। यानी पहचान पुराने किरदारों की है, लेकिन इस बार उनके सामने आने वाली चुनौती और सत्ता की बाजी नई है।

पहले दिन की कमाई
‘मिर्जापुर: द मूवी’ ने धुआंधार ओपनिंग कर डाली। पहले दिन ही भारत में इस फिल्म ने कमाई के मामले में रेकॉर्ड बना डाला है और ये इस साल की तीसरी सबसे बड़ी ओपनिंग वाली हिंदी फिल्म बन चुकी है। Sacnilk की रिपोर्ट के मुताबिक, इस फिल्म मे करीब ₹24.75Cr करोड़ रुपये का नेट कलेक्शन पहले दिन किया है। इस शानदार बॉक्स ऑफिस ओपनिंग के साथ यह क्राइम थ्रिलर फिल्म 2026 की तीसरी सबसे बड़ी हिंदी फिल्म बन चुकी है।

कहानी में क्या है नया?
मिर्जापुर की कहानी का केंद्र हमेशा से सत्ता रही है और फिल्म भी इससे अलग नहीं जाती। यहां भी मिर्जापुर की गद्दी सबसे बड़ी ताकत है। कालीन भैया के कब्जे वाली इस गद्दी पर सिर्फ स्थानीय लोगों की नजर नहीं है, बल्कि अलग-अलग इलाकों से आए खिलाड़ी भी सत्ता की इस कुर्सी पर अपना कब्जा जमाना चाहते हैं। क्योंकि मिर्जापुर पर राज करने का मतलब एक शहर पर हुकूमत के साथ पूरे इलाके में अपनी ताकत का सिक्का चलाना है।

यहीं से फिल्म की असली बाजी शुरू होती है। कालीन भैया को रास्ते से हटाने के लिए नए खिलाड़ी मैदान में उतरते हैं और चालें चलने का सिलसिला शुरू हो जाता है। हर किरदार अपने फायदे के लिए दूसरे का इस्तेमाल करना चाहता है और यही खेल धीरे-धीरे कहानी को आगे बढ़ाता है। इस पूरी साजिश में बब्बन यादव के रूप में रवि किशन की एंट्री फिल्म को नया मोड़ देती है।

बब्बन सीधे लड़ाई लड़ने के बजाय लोगों को अपने हिसाब से इस्तेमाल करने में विश्वास रखता है। वह खुद कम दिखाई देकर पूरी बाजी को पर्दे के पीछे से चलाने की कोशिश करता है। उसका मकसद क्या है, कालीन भैया तक पहुंचने की उसकी रणनीति क्या है और आखिर कौन किसका मोहरा बनता है – फिल्म का बड़ा हिस्सा इन्हीं सवालों के आसपास घूमता है।

सीरीज देखे बिना समझ आएगी फिल्म?
यह फिल्म उन दर्शकों के लिए भी पूरी तरह बंद दरवाजा नहीं है, जिन्होंने मिर्जापुर की सीरीज नहीं देखी है। कहानी को इस तरह आगे बढ़ाया गया है कि नए दर्शक भी मुख्य संघर्ष को समझ सकें। हालांकि पुराने किरदारों के रिश्ते, उनकी पुरानी दुश्मनी और उनके बैकग्राउंड को बेहतर तरीके से समझने के लिए सीरीज देख चुके दर्शकों को निश्चित तौर पर ज्यादा मजा आएगा। फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह पुरानी दुनिया पर निर्भर होने के बावजूद सिर्फ पुराने घटनाक्रम को दोहराने की कोशिश नहीं करती।

गुरमीत सिंह का डायरेक्शन कैसा है?
फिल्म का निर्देशन गुरमीत सिंह ने किया है। उन्होंने मिर्जापुर की पहचान को बरकरार रखते हुए इसे फिल्म के बड़े पर्दे के हिसाब से पेश करने की कोशिश की है। कहानी में एक तरफ पुराने चेहरे और रिश्ते हैं तो दूसरी तरफ नई परिस्थितियां। इन दोनों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं था, लेकिन डायरेक्शन इस मामले में काफी हद तक सफल नजर आता है। फिल्म का ट्रीटमेंट मास ऑडियंस को ध्यान में रखकर किया गया है। जहां जरूरत पड़ती है वहां एक्शन और हिंसा कहानी की रफ्तार बढ़ाते हैं, वहीं किरदारों के बीच के रिश्ते और सत्ता की राजनीति कहानी को सिर्फ मारधाड़ तक सीमित नहीं रहने देते।

राइटिंग बनी फिल्म की बड़ी ताकत
पुनीत कृष्ण की लेखनी फिल्म की सबसे मजबूत कड़ियों में शामिल है। उन्होंने मिर्जापुर की पहले से स्थापित दुनिया को इस्तेमाल करते हुए उसके भीतर एक अलग कहानी रखने की कोशिश की है। पुराने किरदारों को सिर्फ इसलिए नहीं लाया गया कि दर्शक उन्हें पहचानते हैं। उनके जरिए कहानी को नए मोड़ दिए गए हैं। मुन्ना भैया, गुड्डू भैया, बीना और कालीन भैया जैसे किरदारों के व्यवहार में उनकी पुरानी छाप जरूर नजर आती है, लेकिन कहानी में उनके सामने आने वाली परिस्थितियां उन्हें अलग तरीके से इस्तेमाल करती हैं। बीना का बैकग्राउंड खास तौर पर कहानी को एक अलग भावनात्मक और नाटकीय परत देता है। वहीं कई पुराने रिश्तों को नए संदर्भ में देखने का मौका मिलता है।

पंकज त्रिपाठी फिर बने कालीन भैया
मिर्जापुर की बात हो और कालीन भैया का जिक्र न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। पंकज त्रिपाठी एक बार फिर इस किरदार में अपनी मजबूत पकड़ दिखाते हैं। उनका शांत अंदाज, संवाद बोलने का तरीका और बिना ज्यादा शोर किए सामने वाले पर दबाव बनाने की शैली एक बार फिर प्रभाव छोड़ती है। कालीन भैया के किरदार को लेकर दर्शकों के मन में जो छवि बनी हुई है, फिल्म उसे बरकरार रखती है।

बाकी स्टारकास्ट ने भी छोड़ी छाप
अली फजल के गुड्डू भैया और दिव्येंदु के मुन्ना भैया वाले किरदारों की अपनी अलग फैन फॉलोइंग है। दोनों कलाकार एक बार फिर अपने पुराने अंदाज में नजर आते हैं और दर्शकों को उन किरदारों की वही ऊर्जा महसूस होती है, जिसके लिए वे जाने जाते हैं। रसिका दुग्गल की बीना भी फिल्म की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। उनके किरदार को इस बार ज्यादा गहराई देने की कोशिश की गई है। वहीं जितेंद्र कुमार की बबलू पंडित के रूप में मौजूदगी कहानी में नया रंग जोड़ती है। सोनल चौहान का किरदार भी कहानी में एक नया एंगल लेकर आता है और फिल्म की दुनिया को थोड़ा और विस्तार देता है।

रवि किशन की एंट्री सबसे खास
फिल्म में अगर किसी नई एंट्री की सबसे ज्यादा चर्चा हो सकती है, तो वह रवि किशन की है। बब्बन यादव के किरदार में वह मिर्जापुर की दुनिया में बिल्कुल अलग अंदाज लेकर आते हैं। उनका किरदार सिर्फ ताकत और दबंगई पर निर्भर नहीं है। बब्बन अपने तरीके से लोगों को पढ़ता है और रिश्तों को भी अपने खेल का हिस्सा बनाता है। यही बात उसे बाकी किरदारों से अलग करती है। उनके किरदार का डायलॉग “जुबान ही मेरा कॉन्ट्रैक्ट है” भी उनके व्यक्तित्व को काफी हद तक सामने रखता है। रवि किशन ने इस भूमिका में अपनी देसी ऊर्जा और स्क्रीन प्रेजेंस का अच्छा इस्तेमाल किया है।

डायलॉग्स में फिर दिखा मिर्जापुर वाला अंदाज
मिर्जापुर की पहचान हिंसा और किरदारों के साथ उसके डायलॉग्स से भी रही है। फिल्म इस मामले में फैंस को निराश नहीं करती। कई संवाद ऐसे हैं जो कहानी के माहौल को मजबूत करते हैं और थिएटर में दर्शकों की प्रतिक्रिया भी बटोर सकते हैं। खासकर टकराव वाले सीन्स में संवादों का असर ज्यादा महसूस होता है।

क्या फिल्म थोड़ी छोटी हो सकती थी?
फिल्म की सबसे बड़ी कमी इसकी लंबाई कही जा सकती है। करीब 3 घंटे 17 मिनट की यह फिल्म कई जगह थोड़ी खिंची हुई महसूस होती है। पहले हिस्से में किरदारों और कहानी की जमीन तैयार करने में काफी समय लगाया गया है। वहीं दूसरे हिस्से में भी कुछ ऐसे हिस्से हैं जिन्हें थोड़ा टाइट किया जाता तो कहानी और तेज महसूस हो सकती थी। जो दर्शक पहले से मिर्जापुर की दुनिया जानते हैं, उन्हें कुछ जगहों पर यह लंबाई ज्यादा महसूस हो सकती है।

मिर्जापुर का भौकाल बड़े पर्दे पर कायम
Mirzapur The Movie अपने नाम और फ्रेंचाइजी की उम्मीदों पर काफी हद तक खरी उतरती है। फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सिर्फ सीरीज को बड़े पर्दे पर दोहराने के बजाय उसी दुनिया में नई कहानी सुनाने की कोशिश करती है। दमदार कलाकार, सत्ता की जंग, हिंसा, चालबाजी, पुराने किरदारों की वापसी और रवि किशन की नई एंट्री – ये सभी चीजें फिल्म को मास एंटरटेनमेंट का पैकेज बनाती हैं।

अगर आप मिर्जापुर की दुनिया के फैन हैं, तो फिल्म आपके लिए थिएटर में देखने लायक है। वहीं अगर आपने सीरीज नहीं देखी है, तो कहानी को समझने में बहुत बड़ी परेशानी नहीं होगी, लेकिन किरदारों की असली गहराई महसूस करने के लिए सीरीज देखना फायदे का सौदा रहेगा।

रेटिंग: ⭐ 3.5/5

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