US tariff: रूस के साथ भारत के तेल कारोबार को लेकर अमेरिका में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। अमेरिकी संसद में रूस पर नए प्रतिबंधों से जुड़े एक विधेयक में ऐसे संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं, जिनका असर भारत समेत रूस के बड़े व्यापारिक साझेदारों पर पड़ सकता है। प्रस्ताव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस के प्रमुख तेल खरीदार देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने की बात है। हालांकि, यह अभी केवल प्रस्तावित संशोधन हैं और इन्हें अंतिम कानून नहीं माना जा सकता। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में इन संशोधनों पर आगे की प्रक्रिया बाकी है।
रूस पर दबाव बढ़ाने की अमेरिकी कोशिश
‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ को अमेरिकी सीनेट ने 7 अगस्त को 86-11 के भारी बहुमत से पारित किया था। इस विधेयक का मकसद रूस के नेतृत्व, ऊर्जा क्षेत्र और उसके तेल कारोबार पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है। विधेयक में रूस के उस कथित ‘शैडो फ्लीट’ पर भी कार्रवाई का प्रस्ताव है, जिसका इस्तेमाल मॉस्को पर लगे तेल प्रतिबंधों से बचने के लिए किया जाता है। अमेरिका का आरोप है कि रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई यूक्रेन के खिलाफ जारी युद्ध के लिए आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराती है।
भारत और चीन पर क्यों है नजर?
इस पूरे विवाद का सबसे अहम हिस्सा रूस के तेल के बड़े खरीदारों से जुड़ा है। प्रस्तावित कानून में राष्ट्रपति को रूस के प्रमुख तेल खरीदार देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने की बात कही गई है। भारत और चीन रूस के महत्वपूर्ण ऊर्जा व्यापारिक साझेदारों में शामिल हैं। हालांकि सीनेट से पारित मूल विधेयक में इन देशों के नाम सीधे तौर पर दर्ज नहीं किए गए थे। इसमें रूस से तेल और गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े आयातकों का उल्लेख उनकी आयात मात्रा के आधार पर किया गया है। अब प्रतिनिधि सभा में पेश किए गए एक संशोधन ने इस मुद्दे को और स्पष्ट रूप से सामने ला दिया है।
संशोधन में भारत समेत 10 देशों के नाम
डेमोक्रेटिक सांसद स्टेनी होयर ने एक संशोधन प्रस्तावित किया है, जिसमें उन देशों के नाम कानून में शामिल करने की बात कही गई है, जिन्हें रूस के साथ व्यापार के कारण प्रस्तावित माध्यमिक टैरिफ के दायरे में लाया जा सकता है। इस सूची में भारत, चीन, तुर्किये, अजरबैजान, हंगरी, स्लोवाक रिपब्लिक, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, कजाकिस्तान और किर्गिज रिपब्लिक शामिल हैं।
अगर ऐसा संशोधन कानून का हिस्सा बनता है, तो रूस से तेल कारोबार करने वाले इन देशों पर अमेरिकी टैरिफ कार्रवाई का खतरा अधिक स्पष्ट हो सकता है। हालांकि, अंतिम प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रतिनिधि सभा और आगे की विधायी प्रक्रिया में कौन-से प्रावधान मंजूर होते हैं।
एक सांसद ने टैरिफ वाली धारा हटाने की मांग की
जहां एक ओर भारत समेत कई देशों को संभावित टैरिफ के दायरे में शामिल करने का प्रस्ताव सामने आया है, वहीं दूसरी तरफ इसका विरोध भी हो रहा है। डेमोक्रेटिक सांसद ग्रेगरी मीक्स ने अलग संशोधन पेश करते हुए विधेयक की धारा 113 को हटाने की मांग की है। यही धारा राष्ट्रपति को रूस के व्यापारिक साझेदार देशों पर व्यापक माध्यमिक टैरिफ लगाने का अधिकार देने से जुड़ी है।
मीक्स और उनके समर्थक सांसदों का यह प्रस्ताव अगर स्वीकार होता है, तो रूस के साझेदार देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने वाला प्रमुख प्रावधान ही हट सकता है। इन संशोधनों को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की रूल्स कमेटी ने सार्वजनिक किया है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर राहत का भी प्रस्ताव
मीक्स ने प्रतिबंधों से जुड़ा एक और संशोधन प्रस्तावित किया है। इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति को राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरत होने पर किसी विदेशी व्यक्ति पर लागू प्रतिबंधों से अस्थायी छूट देने का अधिकार देने की बात है। प्रस्ताव के मुताबिक यह छूट 90 दिनों तक हो सकती है और जरूरत पड़ने पर इसे आगे भी 90-90 दिनों की अवधि के लिए बढ़ाया जा सकता है।
यूक्रेन को 15 अरब डॉलर के कर्ज का प्रस्ताव
रूस पर दबाव बढ़ाने के साथ-साथ यूक्रेन को आर्थिक और रक्षा सहायता देने का प्रस्ताव भी सामने आया है। ग्रेगरी मीक्स के एक अन्य संशोधन में यूक्रेन को 15 अरब डॉलर का सीधा कर्ज देने का अधिकार देने की बात कही गई है। इस राशि का इस्तेमाल यूक्रेन को रक्षा संबंधी सामान और सेवाएं खरीदने में वित्तीय मदद देने के लिए किया जा सकता है।
क्या हो सकता है आगे?
सीनेट से पारित होने के बाद यह विधेयक अब अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की प्रक्रिया में है। राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए जाने से पहले इसे प्रतिनिधि सभा से भी मंजूरी मिलना जरूरी है। ऐसे में फिलहाल भारत पर 100 फीसदी टैरिफ लगना तय नहीं है। भारत का नाम प्रस्तावित संशोधन में जरूर शामिल किया गया है, लेकिन अंतिम कानून में क्या प्रावधान रहेंगे, यह अमेरिकी संसद की आगे की कार्रवाई पर निर्भर करेगा। यदि माध्यमिक टैरिफ वाला प्रावधान मजबूत रूप में पारित होता है, तो रूस से भारत के ऊर्जा कारोबार पर अमेरिकी दबाव बढ़ने की संभावना है।

