Trade War: अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन चीन से आने वाले सामान पर 7.5 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाने की तैयारी में है। हालांकि, अभी इस प्रस्ताव पर अंतिम मुहर नहीं लगी है और दर में बदलाव की संभावना भी बनी हुई है। लेकिन अगर यह फैसला लागू होता है, तो इसका असर सिर्फ अमेरिका और चीन तक सीमित नहीं रहेगा। भारत समेत दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के लिए इसके नए अवसर और चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
चीन के सस्ते सामान पर अमेरिका की नजर
अमेरिका की चिंता चीन की बढ़ती औद्योगिक क्षमता को लेकर है। चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों से लेकर सोलर पैनल, स्टील, सीमेंट और कई अन्य उत्पादों का बड़े पैमाने पर उत्पादन हो रहा है। दूसरी ओर, चीन की घरेलू मांग अपेक्षाकृत कमजोर रहने के कारण वहां की कंपनियां अपने उत्पादों के लिए विदेशी बाजारों का रुख कर रही हैं। अमेरिका का आरोप है कि चीन अतिरिक्त उत्पादन को कम कीमत पर दूसरे देशों में बेच रहा है। इससे अमेरिकी कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा मुश्किल हो रही है और घरेलू उद्योगों पर दबाव बढ़ रहा है। इसी मुद्दे को लेकर ट्रंप प्रशासन ने चीन की व्यापारिक और औद्योगिक नीतियों की जांच भी शुरू की थी।
7.5 फीसदी टैरिफ का असर क्या होगा?
अगर प्रस्तावित शुल्क लागू होता है, तो चीन से अमेरिका पहुंचने वाले कई उत्पादों पर पहले से मौजूद शुल्क के अलावा 7.5 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाया जा सकता है। इसका सीधा असर आयात लागत पर पड़ेगा और कुछ चीनी उत्पाद अमेरिकी बाजार में महंगे हो सकते हैं। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि यह शुल्क चीन पर दबाव बढ़ाने के लिए पर्याप्त हो सकता है, जबकि दोनों देशों के बीच चल रही व्यापारिक बातचीत को पूरी तरह पटरी से उतरने से भी बचाया जा सकता है। ऐसे समय में यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच संभावित बातचीत पर भी दुनिया की नजर है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नई रणनीति
ट्रंप प्रशासन की नई टैरिफ रणनीति ऐसे समय में सामने आई है, जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट पहले ही ट्रंप की व्यापक टैरिफ योजना पर बड़ा फैसला दे चुका है। इसके बाद अमेरिकी सरकार ने आयात शुल्क लगाने के लिए वैकल्पिक कानूनी रास्तों पर ध्यान बढ़ाया है। चीन की औद्योगिक क्षमता को लेकर शुरू की गई जांच 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत हुई है। यह प्रावधान अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों के खिलाफ व्यापारिक कार्रवाई करने की अनुमति देता है, जिनकी नीतियों को अमेरिकी हितों के लिए नुकसानदायक माना जाता है।
भारत के लिए क्या बदल सकता है?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका-चीन के इस नए टकराव का भारत पर क्या असर पड़ेगा? इसका जवाब पूरी तरह एकतरफा नहीं है। एक तरफ भारत के लिए बड़ा अवसर पैदा हो सकता है। यदि अमेरिकी कंपनियां चीन से आयात कम करती हैं, तो वे वैकल्पिक सप्लाई चेन के लिए भारत की ओर देख सकती हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो कंपोनेंट्स, इंजीनियरिंग उत्पाद, फार्मास्युटिकल्स, टेक्सटाइल और कई अन्य क्षेत्रों में भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का मौका बन सकता है। चीन से जुड़ी कंपनियों के लिए बढ़ती लागत भारत को एक प्रतिस्पर्धी मैन्युफैक्चरिंग डेस्टिनेशन के रूप में मजबूत कर सकती है।
लेकिन दूसरी तरफ खतरे भी कम नहीं हैं। यदि चीन अपने अतिरिक्त सामान को अमेरिका के बजाय भारत जैसे दूसरे बाजारों में अधिक मात्रा में भेजता है, तो भारतीय घरेलू उद्योगों पर कीमतों का दबाव बढ़ सकता है। सस्ते चीनी उत्पादों की बढ़ती आमद स्थानीय निर्माताओं के लिए चुनौती बन सकती है।
चीन के साथ भारत पर भी नजर
अमेरिकी जांच का दायरा चीन तक सीमित नहीं है। भारत के साथ-साथ यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, बांग्लादेश, मैक्सिको, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड और नॉर्वे जैसे देशों की व्यापार नीतियां भी अमेरिकी जांच के दायरे में हैं। हालांकि, इन देशों पर आगे किसी तरह का अतिरिक्त शुल्क लगाया जाएगा या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
1.2 ट्रिलियन डॉलर का चीनी व्यापार अधिशेष
चीन की वैश्विक व्यापार ताकत का अंदाजा उसके विशाल व्यापार अधिशेष से लगाया जा सकता है। पिछले साल चीन का व्यापार अधिशेष करीब 1.2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया था। घरेलू मांग की कमजोरी के बीच निर्यात पर बढ़ती निर्भरता ने चीन और उसके व्यापारिक साझेदारों के बीच तनाव को और बढ़ाया है।
ऐसे में अमेरिका का 7.5 फीसदी संभावित टैरिफ नए शुल्क के साथ वैश्विक सप्लाई चेन में बदलाव का संकेत भी माना जा रहा है। भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर बन सकता है, लेकिन फायदा तभी मिलेगा जब देश अपनी उत्पादन क्षमता, लागत प्रतिस्पर्धा और निर्यात ढांचे को मजबूत कर सके। यानी अमेरिका-चीन की नई टैरिफ लड़ाई में भारत के सामने मौका भी है और चुनौती भी।

