यमन में हूती विद्रोहियों की बढ़ती सैन्य पकड़ ने लाल सागर से लेकर खाड़ी क्षेत्र तक सुरक्षा समीकरण बदल दिए हैं। रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के आसपास हूतियों की गतिविधियां बढ़ने से सऊदी अरब के सामने सुरक्षा के साथ-साथ व्यापार और तेल निर्यात को लेकर भी नई चुनौती खड़ी हो गई है। हालिया घटनाक्रम के बीच पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ रक्षा संबंधों और इजराइल के साथ संभावित खुफिया सहयोग को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।
लाल सागर के अहम इलाकों में हूतियों की बढ़त
यमन के लाल सागर तट पर हूतियों ने हाल के दिनों में अपनी स्थिति मजबूत की है। रिपोर्टों के मुताबिक, रणनीतिक बंदरगाह शहर मोखा पर कब्जे के बाद उनका प्रभाव बाब अल-मंदेब के आसपास भी बढ़ा है। इसके अलावा हनीश द्वीपों समेत कुछ महत्वपूर्ण द्वीपीय इलाकों में भी हूती लड़ाकों की मौजूदगी की खबरें सामने आई हैं। इससे लाल सागर के समुद्री मार्ग पर दबाव बढ़ गया है।
बाब अल-मंदेब कोई सामान्य समुद्री रास्ता नहीं है। यह लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ने वाला रणनीतिक जलडमरूमध्य है। एशिया और यूरोप के बीच समुद्री व्यापार के लिए इसका महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि इसी क्षेत्र से जहाज लाल सागर होते हुए स्वेज नहर तक पहुंचते हैं।
अगर यहां जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक बाधित होती है, तो कंपनियों को अफ्रीका के दक्षिणी हिस्से से होते हुए केप ऑफ गुड होप का लंबा रास्ता अपनाना पड़ सकता है। इससे यात्रा की दूरी, ईंधन खर्च और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है। तेल और अन्य जरूरी सामान की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति पर भी इसका असर पड़ सकता है।
सऊदी अरब के सामने दोहरी चुनौती
हूतियों की बढ़ती मौजूदगी सऊदी अरब के लिए इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि लाल सागर उसके तेल निर्यात के वैकल्पिक समुद्री मार्गों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालिया घटनाक्रम में हूतियों की ओर से सऊदी क्षेत्र और महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाए जाने की खबरें भी सामने आई हैं। 16 सितंबर 2026 को सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने कहा कि उसने मक्का के दक्षिण में एक हूती ड्रोन को मार गिराया। हूतियों ने हालांकि मक्का को निशाना बनाने से इनकार किया।
इससे रियाद की चिंता केवल यमन की सीमा तक सीमित नहीं रह गई है। एक तरफ सऊदी अरब को अपने क्षेत्र और ऊर्जा ढांचे की सुरक्षा करनी है, वहीं दूसरी तरफ लाल सागर के समुद्री रास्ते को सुरक्षित रखना भी उसके लिए महत्वपूर्ण है।
पाकिस्तान ने यमन में सेना भेजने से बनाई दूरी
इसी बीच पाकिस्तान के रुख ने पूरे मामले को और दिलचस्प बना दिया है। 7 अगस्त 2026 को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते में कहा गया है कि तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति को सभी पर हमला माना जाएगा और रक्षा सहयोग को मजबूत किया जाएगा।
हालांकि, इस समझौते को लेकर पाकिस्तान ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह समझौता रक्षात्मक प्रकृति का है और किसी देश के खिलाफ आक्रामक सैन्य गठबंधन नहीं है।
हूतियों के खिलाफ यमन में सीधे सैन्य अभियान में शामिल होने के मामले में पाकिस्तान ने कथित तौर पर दूरी बनाए रखी है। सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान सऊदी अरब की अपनी जमीन की सुरक्षा में मदद करने को तैयार है, लेकिन यमन की धरती पर जाकर युद्ध में शामिल होने से उसने इनकार किया है। यानी सऊदी की रक्षा और यमन में सैन्य हस्तक्षेप को पाकिस्तान अलग-अलग परिस्थितियों के रूप में देख रहा है।
सऊदी-इजराइल संपर्क की खबर क्यों अहम?
पाकिस्तान के इस रुख के बीच सऊदी अरब द्वारा इजराइल से खुफिया मदद लेने की खबर ने क्षेत्रीय राजनीति में नई चर्चा शुरू कर दी है। इकोनॉमिक टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्टों के मुताबिक, सऊदी और इजराइल के बीच हूती खतरे से संबंधित खुफिया सहयोग को लेकर बातचीत हुई है और इसमें अमेरिका की भूमिका बताई गई है।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सऊदी अरब और इजराइल के बीच अभी औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं। ऐसे में हूती खतरे जैसी साझा सुरक्षा चिंता को लेकर संभावित खुफिया संपर्क क्षेत्रीय समीकरणों में बदलाव का संकेत माना जा रहा है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में इसे व्यापक राजनयिक संबंध स्थापित होने के बराबर नहीं बताया गया है।
अमेरिका और ब्रिटेन भी सीधे युद्ध से बच रहे
सऊदी अरब की मुश्किल इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि उसके प्रमुख पश्चिमी सहयोगी यमन में सीधे बड़े सैन्य अभियान में उतरने को लेकर सावधानी बरत रहे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका की ओर से खुफिया और लक्ष्य संबंधी सहयोग की बात सामने आई है, जबकि ब्रिटेन की भूमिका सैन्य सलाह और समर्थन तक सीमित रहने की खबर है।
अमेरिका की इस सावधानी के पीछे क्षेत्र में पहले से चल रहे व्यापक संघर्ष और कई मोर्चों पर सैन्य दबाव को भी एक कारण बताया जा रहा है। ऐसे में सऊदी अरब के सामने चुनौती है कि वह हूतियों के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला किस तरह करे, बिना संघर्ष को और बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदलने के।
बाब अल-मंदेब बंद हुआ तो भारत पर भी पड़ेगा असर
बाब अल-मंदेब में लंबे समय तक अस्थिरता का असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। एशिया और यूरोप के बीच आने-जाने वाले समुद्री जहाजों को वैकल्पिक मार्ग अपनाना पड़ सकता है। इससे परिवहन समय और लागत दोनों बढ़ सकते हैं।
भारत के लिए भी इसका असर महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि वैश्विक समुद्री परिवहन और ऊर्जा बाजार में लाल सागर-सुएज मार्ग की बड़ी भूमिका है। अगर जहाजों को लंबा समुद्री रास्ता अपनाना पड़ता है, तो माल ढुलाई, बीमा और ईंधन की लागत बढ़ने का दबाव बन सकता है। इसका असर आगे चलकर आयातित सामान और ऊर्जा की कीमतों पर पड़ सकता है।
यमन में फिर बढ़ा गृहयुद्ध का खतरा
यमन में लंबे समय से सरकार और हूती विद्रोहियों के बीच संघर्ष चला आ रहा है। 2022 के संघर्षविराम के बाद बड़े पैमाने पर लड़ाई में कमी आई थी, लेकिन हाल के घटनाक्रम ने एक बार फिर युद्ध की आशंका बढ़ा दी है। एपी के मुताबिक, हालिया लड़ाई में हूतियों की सैन्य क्षमता और क्षेत्रीय पकड़ को लेकर चिंता बढ़ी है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि लाल सागर और बाब अल-मंदेब में हूतियों की बढ़ती मौजूदगी को सीमित करने के लिए सऊदी अरब और उसके सहयोगी किस रणनीति को अपनाते हैं। पाकिस्तान का यमन में सीधे सैन्य हस्तक्षेप से पीछे रहना, अमेरिका का सीमित सहयोग और इजराइल के साथ संभावित खुफिया संपर्क इस पूरे घटनाक्रम को पश्चिम एशिया के बदलते सुरक्षा समीकरणों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बना रहे हैं।

