नई दिल्ली में शनिवार से शुरू हो रहे BRICS Summit 2026 पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं। इस शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि करीब 10 साल बाद भारत के मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक साथ नजर आएंगे। तीनों नेता इससे पहले 2016 में गोवा में आयोजित BRICS सम्मेलन में एक साथ शामिल हुए थे।
इस बार भारत में होने वाला सम्मेलन सिर्फ तीन बड़े नेताओं की मुलाकात तक सीमित नहीं है। BRICS का विस्तार होने के बाद संगठन की वैश्विक पहुंच और आर्थिक ताकत पहले की तुलना में काफी बढ़ चुकी है। ऐसे में दिल्ली सम्मेलन में होने वाली बातचीत का असर व्यापार, वैश्विक अर्थव्यवस्था, कूटनीति और विकासशील देशों की राजनीति पर भी दिखाई दे सकता है।
BRICS में शामिल होंगे 21 देशों के नेता
नई दिल्ली में आयोजित सम्मेलन में BRICS के 11 सदस्य देशों के साथ 10 पार्टनर देशों के प्रतिनिधि और नेता भी हिस्सा लेंगे। संगठन की बढ़ती ताकत को केवल सदस्य देशों की संख्या से नहीं समझा जा सकता। इसकी असली ताकत इसके विशाल जनसंख्या आधार और आर्थिक क्षमता में दिखाई देती है।
BRICS के 11 सदस्य देशों में दुनिया की लगभग 49.5 फीसदी आबादी रहती है। यानी वैश्विक आबादी का करीब आधा हिस्सा इस समूह से जुड़ा हुआ है। आर्थिक मोर्चे पर भी संगठन का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। खरीद क्षमता यानी PPP के आधार पर BRICS देशों की संयुक्त अर्थव्यवस्था दुनिया की करीब 39 फीसदी अर्थव्यवस्था के बराबर है। यही वजह है कि BRICS को अब केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का मंच नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण समूह के तौर पर देखा जा रहा है।
आज क्या होगा? ऐसा रहेगा BRICS Summit का कार्यक्रम
दिल्ली में होने वाले सम्मेलन का कार्यक्रम भी काफी अहम है। दोपहर करीब 2 बजे BRICS देशों के नेता सम्मेलन स्थल पर पहुंचेंगे। इसके कुछ देर बाद यानी करीब 2:35 बजे बंद कमरे में नेताओं की बैठक होगी। इस दौरान सदस्य देशों के बीच महत्वपूर्ण वैश्विक और आर्थिक मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है।
इसके बाद शाम 4:25 बजे ‘भारत इनोवेट्स’ प्रदर्शनी आयोजित की जाएगी। शाम 5:05 बजे BRICS नेताओं की फैमिली फोटो होगी और इसके ठीक बाद करीब 5:10 बजे नेता वृक्षारोपण कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे।
दिन के प्रमुख कार्यक्रमों का समापन रात 7:30 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से आयोजित गाला डिनर के साथ होगा।
BRICS के सामने सवाल- आखिर हासिल क्या होगा?
BRICS के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बढ़ते प्रभाव को ठोस आर्थिक और कूटनीतिक उपलब्धियों में कैसे बदला जाए। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से BRICS को लेकर कड़ा रुख अपनाते रहे हैं। खासकर अमेरिकी डॉलर के विकल्प के तौर पर किसी दूसरी मुद्रा को बढ़ावा देने या अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की भूमिका कम करने की कोशिशों को लेकर अमेरिका की चिंता स्पष्ट रही है।
नवंबर 2024 में ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि अगर BRICS देश अमेरिकी डॉलर के स्थान पर किसी दूसरी मुद्रा को बढ़ावा देते हैं, तो उन पर 100 फीसदी टैरिफ लगाया जा सकता है। ऐसे माहौल में दिल्ली सम्मेलन में BRICS की आर्थिक रणनीति पर होने वाली चर्चा काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सदस्य देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान को आसान बनाने के विकल्पों पर भी विचार कर सकते हैं।
न्यू डेवलपमेंट बैंक बना BRICS की बड़ी उपलब्धि
पिछले कुछ वर्षों में BRICS ने कई संस्थागत पहल की हैं। इनमें सबसे प्रमुख उपलब्धियों में न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) को माना जाता है। इस बैंक के माध्यम से बुनियादी ढांचे और विकास से जुड़ी परियोजनाओं के लिए अरबों डॉलर की वित्तीय सहायता स्वीकृत की गई है। इन परियोजनाओं का बड़ा हिस्सा विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ से जुड़ा है। इसके अलावा BRICS ने वित्तीय संकट की स्थिति में सदस्य देशों को सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से करीब 100 अरब डॉलर का रिजर्व फंड भी बनाया है। हालांकि, अब तक इस फंड का इस्तेमाल नहीं किया गया है। BRICS की चर्चा में स्थानीय मुद्राओं में भुगतान का मुद्दा भी लगातार सामने आता रहा है। रूस और ईरान जैसे देश, जो अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं, इस व्यवस्था में विशेष रुचि रखते हैं।
भारत के लिए BRICS Summit क्यों खास?
भारत के लिए यह सम्मेलन सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय बैठक की मेजबानी नहीं है। यह नई दिल्ली के लिए ग्लोबल साउथ की आवाज के तौर पर अपनी भूमिका मजबूत करने का बड़ा अवसर भी है। भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र, IMF और विश्व बैंक जैसी वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों को अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग करता रहा है। BRICS के एजेंडे में भी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, विकासशील देशों की भागीदारी और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। इस लिहाज से भारत अपनी विदेश नीति की प्राथमिकताओं को BRICS के मंच पर मजबूती से सामने रख सकता है।
चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए चुनौती
हालांकि भारत के लिए BRICS के भीतर सब कुछ आसान नहीं होगा। संगठन में चीन का आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव काफी बड़ा है। इसके अलावा अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई हिस्सों में भी चीन की मौजूदगी भारत की तुलना में अधिक मजबूत है। भारत ग्लोबल साउथ में अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इन क्षेत्रों में चीन के प्रभाव से मुकाबला करना एक बड़ी चुनौती है।
BRICS के विस्तार से भारत को इथियोपिया, ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करने तथा अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। यानी BRICS भारत के लिए एक ऐसा मंच बन सकता है, जहां वह आर्थिक साझेदारी के साथ-साथ अपनी कूटनीतिक पहुंच को भी विस्तार दे सके।
सबसे बड़ी परीक्षा होगी साझा बयान पर सहमति
दिल्ली सम्मेलन में भारत की कूटनीतिक सफलता का एक बड़ा पैमाना यह भी होगा कि क्या सभी सदस्य देशों की सहमति से संयुक्त बयान जारी हो पाता है। यह चुनौती इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS के सदस्य देशों के बीच कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर मतभेद मौजूद हैं। ईरान युद्ध, अमेरिका के साथ संबंध और वैश्विक व्यापार व्यवस्था जैसे विषयों पर सभी देशों का रुख एक जैसा नहीं है। इसका संकेत मई में हुई BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक में भी देखने को मिला था। ईरान युद्ध को लेकर मतभेदों के चलते उस बैठक में संयुक्त बयान पर सहमति नहीं बन सकी थी। इसके बाद भारत ने बैठक का सारांश जारी किया था।
क्या BRICS G7 और G20 का विकल्प बन सकता है?
BRICS का प्रभाव बढ़ रहा है, लेकिन इसे सीधे G7 या G20 का विकल्प मानना अभी जल्दबाजी होगी। फिर भी समूह की बढ़ती आबादी, आर्थिक क्षमता और सदस्य देशों की रणनीतिक अहमियत इसे वैश्विक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण ध्रुव बनाती है। दिल्ली सम्मेलन में अगर सदस्य देश आर्थिक सहयोग, स्थानीय मुद्रा में भुगतान, विकास वित्त और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर ठोस प्रगति करते हैं, तो BRICS की भूमिका और मजबूत हो सकती है। ऐसे में मोदी, पुतिन और जिनपिंग की 10 साल बाद एक मंच पर मौजूदगी इस सम्मेलन का सबसे चर्चित दृश्य जरूर होगी, लेकिन असली नजर इस बात पर रहेगी कि दिल्ली से BRICS दुनिया को कितना ठोस और साझा संदेश दे पाता है।

