नई दिल्ली। राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक टकराव अब तेज होता जा रहा है। विवाद की शुरुआत स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम से जुड़े घटनाक्रम से हुई और इसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति के फैसले, बीजेपी के तीखे हमलों और पुलिस शिकायतों ने इसे और बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया। मामला केवल यह नहीं है कि किसी कार्यक्रम में गीत के कितने पद गाए गए, बल्कि इसके केंद्र में 1937 का कांग्रेस का निर्णय, राष्ट्रीय गीत की ऐतिहासिक भूमिका और आज की राजनीति में राष्ट्रवाद की व्याख्या जैसे कई सवाल भी हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की ओर से ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने पर वर्षभर चलने वाला स्मरणोत्सव भी आयोजित किया जा रहा है। आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार यह स्मरणोत्सव 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक चल रहा है। ऐसे समय में गीत को लेकर शुरू हुआ राजनीतिक विवाद और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
वंदे मातरम् को मिला राष्ट्रगान जैसा कानूनी संरक्षण
केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 के जरिए राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को भी कानूनी संरक्षण देने का प्रस्ताव रखा था। इस विधेयक को संसद द्वारा पारित किया गया और 11 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंजूरी दे दी। इसके तहत राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान कानूनी संरक्षण और दर्जा मिल गया है। यह संशोधन राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 में बदलाव करता है। इसका उद्देश्य राष्ट्रगीत के गायन को जानबूझकर रोकने या उसके गायन में शामिल सभा में व्यवधान डालने को भी दंडनीय बनाना है।
संशोधन क्यों और किसके द्वारा किया गया?
यह संशोधन केंद्र सरकार द्वारा संसद में प्रस्तावित किया गया। सरकार के मुताबिक, 1971 के मौजूदा कानून में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के गायन में जानबूझकर बाधा डालने या उसे रोकने पर सजा का प्रावधान है, लेकिन राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के लिए ऐसा स्पष्ट कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं था। इसी अंतर को दूर करने के उद्देश्य से धारा 3 के दायरे में राष्ट्रगीत को भी शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया है।
क्या बदलेगा कानून में?
प्रस्तावित संशोधन के बाद यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत के गायन को जानबूझकर रोकता है अथवा ऐसा गायन कर रही सभा में व्यवधान उत्पन्न करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकेगी। इसमें सजा के प्रावधान में कोई बदलाव नहीं किया गया है। मौजूदा कानून के अनुसार ऐसे अपराध के लिए तीन वर्ष तक का कारावास, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
वहीं, यदि धारा 2 या 3 के तहत किसी व्यक्ति की दूसरी या उसके बाद की दोषसिद्धि होती है, तो कम से कम एक वर्ष के कारावास का प्रावधान पहले की तरह लागू रहेगा। संशोधन का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इससे ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान के समान कानूनी संरक्षण के दायरे में लाने का रास्ता साफ होगा। सरकार ने इस कदम के पीछे 24 जनवरी 1950 की संविधान सभा की बैठक का भी उल्लेख किया है। उस समय डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ‘वंदे मातरम्’ की स्वतंत्रता आंदोलन में ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित करते हुए इसे ‘जन गण मन’ के समान सम्मान दिए जाने की बात कही थी। ऐसे में 2026 का यह प्रस्ताव राष्ट्रगीत को मिलने वाले कानूनी संरक्षण से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
मुख्य विवाद: कांग्रेस के दो पद गाने के फैसले पर अमित शाह का हमला
ताजा विवाद कांग्रेस कार्यसमिति के उस फैसले के बाद बढ़ा, जिसमें पार्टी ने अपने कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो पद गाने की बात कही है। रिपोर्टों के मुताबिक कांग्रेस ने 1937 के अपने प्रस्ताव का हवाला देते हुए यह रुख अपनाया है। वहीं, जहां कांग्रेस की सरकार होगी, वहां पूरे गीत के गायन की बात कही गई है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के इस फैसले को लेकर पार्टी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि 1937 में कांग्रेस ने तुष्टिकरण की राजनीति के कारण ‘वंदे मातरम्’ के दो हिस्से किए और इसे देश के विभाजन की नींव से जोड़ते हुए कहा कि भारत ने उस फैसले के गंभीर परिणाम भुगते हैं।
शाह ने कांग्रेस पर शहीदों और बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना का अपमान करने का भी आरोप लगाया। उनका कहना है कि आज जब ‘वंदे मातरम्’ की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इसे राष्ट्रीय एकता से जोड़कर व्यापक स्तर पर मनाया जा रहा है, तब कांग्रेस का 1937 के प्रस्ताव का सहारा लेना उचित नहीं है। यह बीजेपी का राजनीतिक आरोप है और इसी को लेकर दोनों दलों के बीच बयानबाजी तेज हुई है।
आखिर 1937 में हुआ क्या था?
विवाद को समझने के लिए 1937 के कांग्रेस प्रस्ताव को समझना जरूरी है। कांग्रेस के मौजूदा रुख के पीछे यही ऐतिहासिक निर्णय प्रमुख आधार है। कांग्रेस का तर्क है कि गीत के शुरुआती दो पदों को लेकर व्यापक स्वीकार्यता रही है, जबकि बाद के हिस्सों में धार्मिक संदर्भ होने के कारण सभी समुदायों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए शुरुआती पदों तक सीमित रहने का फैसला किया गया था।
बीजेपी इसी फैसले को तुष्टिकरण की राजनीति से जोड़ रही है। अमित शाह का आरोप है कि उस समय लिए गए निर्णय ने आगे चलकर देश के राजनीतिक घटनाक्रम को प्रभावित किया। इस तरह 1937 का एक पुराना राजनीतिक फैसला 2026 की सियासत में फिर से बहस के केंद्र में आ गया है।
15 अगस्त के कांग्रेस मुख्यालय का घटनाक्रम
मौजूदा विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण अध्याय 15 अगस्त 2026 को कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम से जुड़ा है। इस कार्यक्रम में ‘वंदे मातरम्’ का गायन हुआ। इसी दौरान बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि गीत के गायन को रोकने या उसमें व्यवधान डालने की कोशिश हुई।
सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो और तस्वीरों को लेकर बीजेपी नेताओं ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर सवाल उठाए। बीजेपी का आरोप था कि कांग्रेस नेतृत्व राष्ट्रगीत के पूरे गायन को लेकर असहज दिखाई दिया। दूसरी ओर, कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज किया। पार्टी की ओर से कहा गया कि सोनिया गांधी गीत को रोकने का संकेत नहीं दे रही थीं, वह कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए कुर्सी मंगाने की बात कर रही थीं क्योंकि वह काफी देर से खड़े थे। यहीं से विवाद ने राजनीतिक रूप ले लिया और बीजेपी नेताओं ने इसे राष्ट्रगीत के कथित अपमान का मुद्दा बना दिया।
विवाद पहुंचा पुलिस तक
मामला राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा। 16 अगस्त को दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के वकील शुभ शर्मा की ओर से सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ पुलिस शिकायत दिए जाने की खबर सामने आई। शिकायत में कांग्रेस मुख्यालय के स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के दौरान ‘वंदे मातरम्’ के कथित तौर पर बाधित किए जाने का आरोप लगाया गया।
शिकायतकर्ता ने मामले की जांच और संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की मांग की। दिल्ली पुलिस की ओर से कहा गया कि 15 अगस्त के कार्यक्रम के दौरान हुई कथित घटना से संबंधित शिकायत की जांच की जा रही है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि शिकायत दर्ज होना आरोप की जांच की शुरुआत है, इसे किसी व्यक्ति की दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता।
इसी तरह कर्नाटक और अन्य स्थानों पर भी बीजेपी नेताओं की ओर से शिकायतें किए जाने की खबरें सामने आईं। कुछ मामलों में पुलिस ने कानूनी राय लेने की बात कही, जबकि तत्काल एफआईआर दर्ज होने की पुष्टि नहीं हुई।
गोवा में दो पदों के गायन ने फिर बढ़ाया विवाद
दिल्ली के घटनाक्रम के कुछ ही दिनों बाद विवाद का एक और अध्याय गोवा से सामने आया। कांग्रेस के एक कार्यक्रम में ‘वंदे मातरम्’ के केवल शुरुआती दो पद गाए गए। कार्यक्रम में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भी मौजूद थे। इसके बाद बीजेपी ने कांग्रेस पर फिर निशाना साधते हुए सवाल उठाया कि आखिर पार्टी पूरे गीत के बजाय दो पदों तक ही क्यों सीमित रह रही है।
यह घटना महत्वपूर्ण इसलिए बनी क्योंकि इससे कांग्रेस के 1937 के प्रस्ताव के आधार पर लिए गए मौजूदा फैसले को बीजेपी के आरोपों से जोड़ने का मौका मिला। बीजेपी ने इसे राष्ट्रगीत के प्रति कांग्रेस के रवैये का उदाहरण बताया, जबकि कांग्रेस अपने निर्णय को ऐतिहासिक प्रस्ताव और सभी समुदायों की भावनाओं के संदर्भ में देख रही है।
बीजेपी की मांग: कांग्रेस मांगे माफी
विवाद बढ़ने के बाद बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस से माफी मांगने की मांग की। बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद समेत कई नेताओं ने कहा कि जिस पार्टी ने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया, उसके वर्तमान नेतृत्व की ओर से ‘वंदे मातरम्’ के प्रति ऐसा रवैया स्वीकार्य नहीं है। बीजेपी का तर्क है कि ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण प्रतीक रहा है और इसे लेकर किसी भी तरह का कथित अनादर देश की भावनाओं से जुड़ा विषय है। पार्टी इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से जनता के बीच ले जाने की बात भी कह रही है।
खरगे का पलटवार, देशभक्ति का ज्ञान न दे बीजेपी
बीजेपी के हमलों पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी तीखा जवाब दिया। उन्होंने बीजेपी पर कांग्रेस को देशभक्ति का पाठ पढ़ाने का आरोप लगाया और कहा कि कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। खरगे ने बीजेपी के नेताओं और उनके राजनीतिक पूर्वजों को लेकर भी सवाल उठाए। इस तरह विवाद ‘वंदे मातरम्’ के गायन से आगे बढ़कर दोनों दलों के बीच देशभक्ति की राजनीतिक व्याख्या की लड़ाई बन गया है।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के वंशज ने भी जताई नाराजगी
विवाद में एक अलग पक्ष तब सामने आया जब ‘वंदे मातरम्’ के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के वंशज सुमित्रो चटर्जी ने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर कांग्रेस मुख्यालय में हुए घटनाक्रम पर दुख जताया। उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के दिन हुई कथित घटना को ऐतिहासिक दृष्टि से दुर्भाग्यपूर्ण बताया। यह प्रतिक्रिया इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विवाद अब केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गीत की ऐतिहासिक विरासत से जुड़े लोगों की भावनाएं भी सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बन गई हैं।
विवाद का सबसे बड़ा सवाल क्या है?
पूरे मामले को देखें तो 2026 का ‘वंदे मातरम्’ विवाद तीन स्तरों पर आगे बढ़ता दिखाई देता है। पहला, कांग्रेस का 1937 के प्रस्ताव के आधार पर शुरुआती दो पदों तक सीमित रहने का निर्णय। दूसरा, 15 अगस्त के कांग्रेस मुख्यालय में हुए कार्यक्रम को लेकर बीजेपी द्वारा लगाए गए आरोप और कांग्रेस की सफाई। तीसरा, इन आरोपों के बाद पुलिस शिकायतों और गोवा के कार्यक्रम में दो पदों के गायन से पैदा हुआ नया राजनीतिक विवाद। इस बीच केंद्र सरकार ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने का स्मरणोत्सव मना रही है और आधिकारिक स्तर पर इसके ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित किया जा रहा है।
इसलिए यह विवाद एक गीत के गायन तक सीमित नहीं है। इसके भीतर इतिहास, राष्ट्रवाद, राजनीतिक विचारधारा, धार्मिक भावनाएं और चुनावी राजनीति सभी एक साथ दिखाई दे रहे हैं। आने वाले दिनों में कांग्रेस और बीजेपी इस मुद्दे को किस तरह जनता के सामने रखते हैं और पुलिस शिकायतों की जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल इतना साफ है कि ‘वंदे मातरम्’ 2026 में एक बार फिर देश की राजनीतिक बहस के केंद्र में आ चुका है।

