संसद का मॉनसून सत्र खत्म होने से ठीक एक दिन पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने NEET प्रदर्शन और प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार होने की बात कहकर राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी। जिस मुद्दे को लेकर विपक्ष कई दिनों से सरकार पर दबाव बना रहा था, उस पर शाह की ओर से अचानक चर्चा की पेशकश ऐसे समय आई, जब संसद का सत्र अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका था। यही वजह है कि अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अमित शाह ने इतने दिनों तक चुप रहने के बाद आखिरी समय में चर्चा की पेशकश क्यों की और कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के बजाय अपनी रणनीति क्यों बदल दी?
तीन हफ्ते के गतिरोध के बाद आया बड़ा बयान
अमित शाह ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर विपक्ष से बातचीत के बाद NEET प्रदर्शन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कराने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि सरकार इस विषय पर विस्तार से चर्चा के लिए तैयार है और वह सदन में मौजूद रहकर विपक्ष के सवालों का जवाब देंगे। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी सरकार की ओर से चर्चा के लिए समय बढ़ाने की तैयारी का संकेत दिया। शाह ने संसद के बाहर कहा कि सरकार कई घंटे तक चर्चा के लिए तैयार है और उसके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है।
लेकिन विपक्ष के लिए सवाल सिर्फ चर्चा का नहीं था। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की मुख्य मांग प्रदर्शनकारियों पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर गृह मंत्री से जवाब और जवाबदेही की थी। विपक्ष का आरोप रहा कि छात्रों के आंदोलन के दौरान पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल किया और इस पूरे मामले में जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
आखिर अब क्यों बोले अमित शाह?
अमित शाह के इस कदम को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों की राय अलग-अलग है, लेकिन एक बात पर चर्चा जरूर हो रही है – अगर सरकार चर्चा के लिए तैयार थी तो यह पहल सत्र के शुरुआती दिनों में क्यों नहीं हुई?
वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी इसी सवाल को उठाया। उनका तर्क है कि सरकार की ओर से यह पेशकश काफी देर से आई। जब तक अमित शाह ने चर्चा की बात कही, तब तक विपक्ष अपनी मांग को आगे बढ़ाकर गृह मंत्री के इस्तीफे तक ले जा चुका था। यानी जिस समय सरकार चर्चा के जरिए गतिरोध समाप्त करने की कोशिश कर रही थी, उस समय विपक्ष के लिए मुद्दा सिर्फ संसद में बयान सुनना नहीं रह गया था। अब कांग्रेस इसे जवाबदेही और राजनीतिक जिम्मेदारी से जोड़ रही थी।
सरकार की छवि और सत्र का आखिरी दौर
राजनीतिक विश्लेषक उर्मिलेश के मुताबिक, इस पूरे आंदोलन का सबसे बड़ा राजनीतिक असर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि पर पड़ा। उनके अनुसार, आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया और सार्वजनिक नारों में प्रधानमंत्री को अधिक निशाना बनाया गया, जबकि गृह मंत्री अमित शाह पर सवाल मुख्य रूप से 20 जुलाई के बाद तेज हुए।
ऐसे में मॉनसून सत्र के दौरान गृह मंत्री का सदन में दिखाई न देना भी विपक्ष के लिए राजनीतिक मुद्दा बन गया। जब परीक्षा प्रणाली और छात्रों से जुड़े मुद्दों पर संसद में चर्चा चल रही थी, तब भी अमित शाह की सक्रिय मौजूदगी विपक्ष को नजर नहीं आई। विश्लेषकों का मानना है कि सत्र के अंतिम चरण में चर्चा की पेशकश सरकार की ओर से माहौल को नियंत्रित करने और संसद की कार्यवाही को सकारात्मक संदेश के साथ समाप्त करने की कोशिश भी हो सकती है।
कांग्रेस ने क्यों बदल दी अपनी रणनीति?
दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस की रणनीति में बदलाव को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चा है। शुरुआत में विपक्ष की प्रमुख मांग थी कि अमित शाह सदन में आएं, बयान दें और प्रदर्शनकारियों पर हुई कार्रवाई से जुड़े सवालों का जवाब दें। लेकिन जब सरकार ने आखिरी समय में चर्चा की पेशकश की, तब तक कांग्रेस ने अपना रुख और सख्त कर लिया। अब राहुल गांधी समेत विपक्ष के कई नेता सिर्फ चर्चा के पक्ष में नहीं दिखाई दिए, बल्कि गृह मंत्री की जवाबदेही और इस्तीफे की मांग पर जोर देने लगे। कांग्रेस का तर्क है कि केवल भाषण या सामान्य चर्चा से उन सवालों का जवाब नहीं मिलेगा, जो प्रदर्शनकारियों पर कथित बल प्रयोग को लेकर उठे हैं।
राहुल गांधी ने क्यों कहा – “हमें भाषण नहीं चाहिए”?
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अमित शाह की चर्चा की पेशकश को स्वीकार नहीं किया। उनका कहना था कि युवाओं को किसी सामान्य राजनीतिक भाषण की जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें सीधे सवालों के जवाब चाहिए। राहुल गांधी ने प्रदर्शन के दौरान छात्रों के साथ हुई कथित हिंसा को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए।
उन्होंने पूछा कि पुलिस कार्रवाई का आदेश किसने दिया? छात्रों के खिलाफ बल प्रयोग का निर्देश किस स्तर से आया? अगर गृह मंत्री ने आदेश दिया था तो उनकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और अगर आदेश उनकी जानकारी के बिना हुआ तो फिर प्रशासनिक जवाबदेही किसकी है? कांग्रेस ने इसी तर्क के आधार पर चर्चा से आगे बढ़कर इस्तीफे की मांग को राजनीतिक केंद्र बना दिया।
अमित शाह का पलटवार
अमित शाह ने भी विपक्ष के आरोपों को सीधे खारिज करते हुए कहा कि सरकार चर्चा से भाग नहीं रही है। उनका कहना था कि संसदीय प्रक्रिया के तहत पहले चर्चा होगी और उसके बाद सरकार सवालों का जवाब देगी। शाह ने यह भी आरोप लगाया कि विपक्ष खुद चर्चा नहीं होने दे रहा। उन्होंने कहा कि वह संसद में किसी भी सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हैं और अब जनता को तय करना चाहिए कि वास्तव में कौन जवाब देने से बच रहा है।
यानी दोनों पक्षों के बीच विवाद अब सिर्फ NEET प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा। यह सवाल भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया कि संसद में चर्चा कौन रोक रहा है और जवाबदेही से कौन बच रहा है।
संसद में क्यों नहीं बन सकी सहमति?
मॉनसून सत्र के दौरान विपक्ष और सरकार के बीच लगातार टकराव देखने को मिला। हंगामे के कारण प्रश्नकाल और सामान्य संसदीय कामकाज प्रभावित हुआ और कई विधेयक भी भारी शोर-शराबे के बीच पारित हुए। ऐसे माहौल में NEET प्रदर्शन का मुद्दा भी राजनीतिक गतिरोध का एक बड़ा कारण बन गया। विपक्ष लगातार गृह मंत्री के बयान की मांग करता रहा, जबकि सरकार का कहना था कि चर्चा के बाद ही मंत्री जवाब देंगे। यही प्रक्रिया दोनों पक्षों के बीच अविश्वास को और बढ़ाती चली गई।
अब असली सवाल क्या है?
अमित शाह की आखिरी समय में आई चर्चा की पेशकश और कांग्रेस के बदले रुख ने इस पूरे विवाद को नया राजनीतिक मोड़ दे दिया है। सरकार इसे संवाद और जवाब देने की अपनी तैयारी के रूप में पेश कर रही है, जबकि विपक्ष इसे देर से उठाया गया कदम और जवाबदेही से बचने की कोशिश बता रहा है।
कांग्रेस के लिए भी यह सिर्फ संसद की बहस का मुद्दा नहीं रह गया। पार्टी अब इसे युवाओं, परीक्षा व्यवस्था, पुलिस कार्रवाई और सरकार की जवाबदेही से जोड़कर जनता के बीच ले जाने की कोशिश कर सकती है। दूसरी ओर, सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह छात्रों से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर विपक्ष के आरोपों का कितना प्रभावी जवाब दे पाती है।
फिलहाल सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि जिस चर्चा की मांग विपक्ष ने आंदोलन और संसद सत्र की शुरुआत में की थी, वही चर्चा की पेशकश सरकार ने सत्र के अंतिम दिन की लेकिन तब तक विपक्ष की मांग बदल चुकी थी।
राजनीति में समय और परिस्थितियां अक्सर रणनीति का रुख बदल देती हैं। इस मामले में भी यही दिखाई दे रहा है। सरकार चर्चा को समाधान की दिशा में कदम बता रही है, जबकि कांग्रेस इसे जवाबदेही के सवाल से जोड़ रही है। अब देखना यह होगा कि यह विवाद संसद की बहस तक सीमित रहता है या आने वाले दिनों में छात्रों और युवाओं के बीच एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता है।

