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मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पांच आरोपी दोषी, 3 साल की जेल और 50 हजार रुपये जुर्माना

मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पांच आरोपी दोषी, 3 साल की जेल और 50 हजार रुपये जुर्माना

लखनऊ। प्रवर्तन निदेशालय (ED) के लखनऊ जोनल कार्यालय को मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में बड़ी सफलता मिली है। गाजियाबाद की विशेष अदालत ने सिंडिकेट बैंक से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पांच आरोपियों को दोषी ठहराते हुए तीन साल के कठोर कारावास और 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। यह फैसला 3 नवंबर 2026 को धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत दर्ज केस संख्या 5/23 में सुनाया गया।

दोषी ठहराए गए आरोपियों में वी.एन. माथुर, राजीव कुमार, अरविंद चौधरी, अंकित चौधरी और प्रमोद कुमार शामिल हैं। अदालत ने प्रत्येक आरोपी पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। जुर्माना जमा नहीं करने की स्थिति में उन्हें तीन महीने का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा।

CBI की एफआईआर के आधार पर शुरू हुई जांच

ईडी ने यह मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की एंटी करप्शन ब्रांच (ACB), गाजियाबाद की ओर से दर्ज दो एफआईआर के आधार पर अपने हाथ में लिया था। ये एफआईआर सिंडिकेट बैंक के मुख्य सतर्कता अधिकारी की शिकायत पर दर्ज की गई थीं।

इस मामले के मूल अपराध में सीबीआई की विशेष अदालत संख्या-2, गाजियाबाद ने तत्कालीन शाखा प्रबंधक वी.एन. माथुर को भारतीय दंड संहिता (IPC) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत दोषी ठहराया था। वहीं, राजीव कुमार और प्रमोद कुमार को मूल अपराध के मामले में बरी कर दिया गया था।

हालांकि, ईडी की ओर से मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में पेश किए गए साक्ष्यों के आधार पर राजीव कुमार और प्रमोद कुमार को भी दोषी ठहराया गया है। यह मामला मूल अपराध से अलग मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों से संबंधित था।

फर्जी दस्तावेजों के आधार पर स्वीकृत कराए गए ऋण

ईडी की जांच के मुताबिक, वर्ष 2006-07 के दौरान सिंडिकेट बैंक की गजरौला शाखा के तत्कालीन शाखा प्रबंधक वी.एन. माथुर ने दिवंगत नरेंद्र सिंह, अरविंद चौधरी और अन्य लोगों के साथ मिलकर आपराधिक साजिश रची थी।

जांच में सामने आया कि इस साजिश के तहत आरोपियों, उनकी फर्मों और सहयोगियों को ऋण तथा ओवरड्राफ्ट की सीमाएं स्वीकृत कराई गईं। इसके लिए फर्जी बिक्री विलेख, अस्तित्वहीन संपत्तियों के दस्तावेज, गलत गैर-बाधा प्रमाणपत्र और फर्जी मूल्यांकन रिपोर्ट का इस्तेमाल किया गया।

ईडी के अनुसार, ऋण के रूप में प्राप्त रकम का इस्तेमाल उस उद्देश्य के लिए नहीं किया गया, जिसके लिए उसे स्वीकृत किया गया था। इसके बजाय रकम की नकद निकासी की गई और उसकी अवैध उत्पत्ति छिपाने के लिए विभिन्न बचत बैंक खातों तथा डिमांड ड्राफ्ट के जरिए धन को इधर-उधर किया गया।

अवैध धन से खरीदी गईं अचल संपत्तियां

जांच में यह भी सामने आया कि बैंक से प्राप्त अवैध धन का इस्तेमाल अचल संपत्तियां खरीदने में किया गया। इनमें तत्कालीन जिला जे.पी. नगर के अलीपुर स्थित एक प्लॉट और देहरादून में खरीदा गया एक अन्य प्लॉट शामिल है।

ईडी के मुताबिक, आरोपियों ने अपराध से अर्जित धन को जानबूझकर प्राप्त किया, अपने कब्जे में रखा, इस्तेमाल किया और उसकी वास्तविक उत्पत्ति छिपाई। साथ ही, इस अवैध धन को वैध संपत्ति के रूप में पेश करने का प्रयास किया गया।

PMLA की धारा 3 के तहत दोषसिद्धि

ईडी की जांच में सामने आए साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने आरोपियों को धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 की धारा 3 के तहत मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध में दोषी ठहराया। यह अपराध अधिनियम की धारा 4 के तहत दंडनीय है।

अदालत के फैसले के बाद पांचों आरोपियों को तीन साल के कठोर कारावास और 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई है। यह मामला बैंक ऋण के जरिए कथित तौर पर अर्जित अवैध धन को छिपाने और उसे संपत्तियों में निवेश करने से जुड़ा है।

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