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जब असुरों ने छीन लिया था अमृत कलश … धनतेरस पर अमृत कलश लेकर ही क्यों प्रकट हुए भगवान धन्वंतरि? जानिए समुद्र मंथन की पौराणिक कथा

जब असुरों ने छीन लिया था अमृत कलश … धनतेरस पर अमृत कलश लेकर ही क्यों प्रकट हुए भगवान धन्वंतरि? जानिए समुद्र मंथन की पौराणिक कथा

धनतेरस का त्योहार आते ही बाजारों में रौनक बढ़ जाती है। कहीं सोने-चांदी की खरीदारी होती है तो कहीं लोग नए बर्तन, आभूषण और दूसरी शुभ वस्तुएं घर लाते हैं। मान्यता है कि इस दिन खरीदारी करने से घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि धनतेरस का संबंध धन-दौलत से नहीं, अच्छी सेहत और लंबी उम्र से भी है? दरअसल, इस पर्व का सीधा जुड़ाव भगवान धन्वंतरि से माना जाता है, जिन्हें आयुर्वेद का जनक और देवताओं का वैद्य कहा जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे। उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था। यही वजह है कि इस दिन को धनतेरस या धनत्रयोदशी के रूप में मनाया जाता है। लेकिन एक सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है कि आखिर भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर ही क्यों प्रकट हुए थे? इसके पीछे कौन-सा धार्मिक संदेश छिपा है? आइए जानते हैं समुद्र मंथन से जुड़ी इस दिलचस्प कथा और धनतेरस के वास्तविक महत्व के बारे में।

समुद्र मंथन की शुरुआत कैसे हुई थी?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय ऐसा आया जब देवताओं की शक्ति कमजोर पड़ने लगी थी। ऐसे में देवताओं को अपनी शक्ति वापस पाने और अमृत प्राप्त करने की आवश्यकता महसूस हुई। इसके लिए भगवान विष्णु की सलाह पर देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन करने का निर्णय लिया।

समुद्र मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथनी बनाया गया और नागराज वासुकि को रस्सी के रूप में इस्तेमाल किया गया। देवता और असुर दोनों ओर से वासुकि नाग को खींचने लगे। लेकिन मंथन के दौरान मंदराचल पर्वत समुद्र में डूबने लगा। तब भगवान विष्णु ने कच्छप यानी कछुए का अवतार धारण किया और अपनी पीठ पर पर्वत को सहारा दिया।

इसके बाद समुद्र मंथन की प्रक्रिया आगे बढ़ी और समुद्र से एक के बाद एक कई अद्भुत रत्न और दिव्य वस्तुएं निकलने लगीं। इनमें माता लक्ष्मी, ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा घोड़ा, कौस्तुभ मणि और कल्पवृक्ष जैसी दिव्य वस्तुओं का उल्लेख मिलता है।

समुद्र से निकला भयंकर विष, फिर अमृत का इंतजार
समुद्र मंथन के दौरान कई बहुमूल्य रत्न निकले, जिसमें एक अत्यंत भयानक विष भी प्रकट हुआ। इस विष की शक्ति इतनी खतरनाक थी कि उससे पूरी सृष्टि पर संकट मंडराने लगा। देवताओं और असुरों के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई।

तब संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। इसी कारण उन्हें नीलकंठ कहा जाता है। भगवान शिव के विषपान के बाद समुद्र मंथन की प्रक्रिया फिर आगे बढ़ी। अब सभी को उस दिव्य अमृत की प्रतीक्षा थी, जिसे पाने के लिए यह पूरा प्रयास किया जा रहा था।

हाथों में अमृत कलश लेकर क्यों प्रकट हुए भगवान धन्वंतरि?
श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध में समुद्र मंथन और भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य का वर्णन मिलता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, मंथन के दौरान समुद्र से एक तेजस्वी और दिव्य पुरुष प्रकट हुए। उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था। यही भगवान धन्वंतरि थे, जिन्हें भगवान विष्णु का अंशावतार माना जाता है। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का देवता और चिकित्सा विज्ञान का अधिष्ठाता माना जाता है।

दरअसल, अमृत को पौराणिक परंपरा में अमरता और जीवन का प्रतीक माना गया है। वहीं आयुर्वेद का उद्देश्य मनुष्य को स्वस्थ रखना, बीमारियों से बचाना और जीवन को बेहतर बनाना है। इसी वजह से भगवान धन्वंतरि के हाथों में अमृत कलश को आरोग्य, जीवन शक्ति और दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य इस बात का संदेश देता है कि जीवन में धन-संपत्ति जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी स्वस्थ शरीर भी है। बिना अच्छे स्वास्थ्य के सुख-सुविधाओं और धन-दौलत का पूरा आनंद लेना संभव नहीं है।

असुरों ने छीन लिया था अमृत का कलश
पौराणिक कथा के अनुसार, जैसे ही भगवान धन्वंतरि अमृत से भरा कलश लेकर प्रकट हुए, असुरों की नजर उस पर पड़ गई। वे किसी भी कीमत पर अमृत प्राप्त करना चाहते थे। इसी लालच में उन्होंने भगवान धन्वंतरि के हाथों से अमृत कलश छीन लिया।

अमृत असुरों के हाथों में चला जाने से देवता चिंतित हो गए। उन्हें डर था कि यदि असुरों ने अमृत पी लिया तो उनकी शक्ति और भी बढ़ जाएगी। इसके बाद सभी देवता भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उनसे सहायता मांगी।

देवताओं की मदद के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया। मोहिनी के रूप और आकर्षण से असुर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अमृत बांटने की जिम्मेदारी उन्हीं को सौंप दी।

इसके बाद मोहिनी ने देवताओं और असुरों को अलग-अलग बैठाया और अमृत वितरण शुरू किया। पौराणिक कथा के अनुसार, उन्होंने अमृत देवताओं को पिलाया। इस तरह देवताओं को अमृत प्राप्त हुआ और वे फिर से शक्तिशाली हो गए।

धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा का महत्व?
धनतेरस को धनत्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इसी शुभ तिथि पर भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए इस दिन उनकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और स्वास्थ्य का देवता माना जाता है। उनकी पूजा करने के पीछे परिवार के सदस्यों के अच्छे स्वास्थ्य, निरोगी शरीर और लंबी उम्र की कामना जुड़ी हुई है।

यही कारण है कि धनतेरस का महत्व केवल सोना, चांदी या बर्तन खरीदने तक सीमित नहीं है। इस दिन लोग भगवान धन्वंतरि से प्रार्थना करते हैं कि उनके परिवार में सुख-शांति बनी रहे और सभी सदस्य स्वस्थ रहें।

कई स्थानों पर इस अवसर पर आयुर्वेद और चिकित्सा से जुड़े धार्मिक आयोजन भी किए जाते हैं। आयुर्वेद में रुचि रखने वाले लोग इस दिन को विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं।

कथा से मिलता है खास संदेश
भगवान धन्वंतरि की समुद्र मंथन से जुड़ी कथा हमें जीवन की एक महत्वपूर्ण सीख देती है। धन और समृद्धि का अपना महत्व है, लेकिन अच्छी सेहत के बिना इनका आनंद अधूरा है। अमृत कलश इसी जीवन शक्ति, आरोग्य और दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है। इसलिए धनतेरस पर सोना-चांदी और नए बर्तन खरीदने के साथ अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखने का संकल्प लेना भी इस पर्व की भावना से जुड़ा हुआ है।

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