पितृ पक्ष का समय हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और स्मरण का विशेष अवसर माना जाता है। इन दिनों परिवार अपने दिवंगत परिजनों के लिए श्राद्ध, तर्पण और अन्य धार्मिक कर्म करते हैं। आमतौर पर पितृ पक्ष 16 दिनों का होता है, लेकिन इस वर्ष तिथियों की गणना में बदलाव के कारण यह अवधि 15 दिनों की बताई जा रही है। इसकी प्रमुख वजह 2 अक्टूबर को षष्ठी और सप्तमी तिथि का एक ही दिन पड़ना है।
ऐसे में जिन परिवारों में पितरों की मृत्यु तिथि षष्ठी या सप्तमी है, उनके सामने श्राद्ध को लेकर सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर दोनों तिथियों का कर्म किस दिन और किस समय किया जाए। इस विषय पर गोरखपुर के ज्योतिषाचार्य एवं धर्मगुरु डॉ. धनेश मणि त्रिपाठी के अनुसार, तिथि क्षय के कारण कभी-कभी दो तिथियां एक ही दिन आ सकती हैं। ऐसी स्थिति में श्रद्धालुओं को परेशान होने की आवश्यकता नहीं है और दोनों तिथियों के श्राद्ध कर्म एक ही दिन किए जा सकते हैं।
2 अक्टूबर को कब करें श्राद्ध और तर्पण?
पितरों के निमित्त श्राद्ध कर्म के लिए दिन के विशेष समय को महत्वपूर्ण माना जाता है। 2 अक्टूबर को श्राद्ध और तर्पण करने वाले लोग इन मुहूर्तों का ध्यान रख सकते हैं।
कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:31 बजे से दोपहर 12:36 बजे तक
रोहिणी मुहूर्त: दोपहर 12:32 बजे से 1:20 बजे तक
अपराह्न काल: दोपहर 1:20 बजे से 3:45 बजे तक
इनमें विशेष रूप से अपराह्न काल को श्राद्ध कर्म के लिए उपयोगी माना जाता है। हालांकि, स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में थोड़ा अंतर संभव है।
षष्ठी और सप्तमी का श्राद्ध किस दिन होगा?
श्राद्ध कर्म सामान्य कैलेंडर की तारीख के बजाय मृत व्यक्ति की मृत्यु के समय लागू हिंदू पंचांग की तिथि के आधार पर किया जाता है। इसलिए यदि परिवार में किसी व्यक्ति का निधन षष्ठी तिथि को हुआ था और दूसरे पितर का निधन सप्तमी तिथि को, तो 2 अक्टूबर को दोनों के लिए श्राद्ध कर्म किया जा सकता है।
ज्योतिषाचार्य डॉ. धनेश मणि त्रिपाठी के अनुसार, अलग-अलग पंचांगों में तिथि को लेकर कुछ अंतर देखने को मिल सकता है। कुछ लोगों ने षष्ठी का श्राद्ध 1 अक्टूबर को किया है, जबकि कुछ परिवार 2 अक्टूबर को इसे करेंगे। 2 अक्टूबर को दोनों तिथियों के श्राद्ध के लिए उपयुक्त दिन माना जा रहा है।
इस तरह करें पितरों का श्राद्ध
श्राद्ध के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और सात्त्विक भोजन तैयार करें। इसके बाद भगवान विष्णु और अपने पितरों का स्मरण करते हुए धार्मिक विधि शुरू करें। कुश, काले तिल और जल से तर्पण किया जाता है। पिंडदान के लिए चावल, तिल आदि सामग्री का प्रयोग किया जा सकता है।
इसके बाद पितरों का स्मरण और पूजा कर ब्राह्मण को भोजन कराने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध कर्म श्रद्धा और विधि-विधान के साथ करना महत्वपूर्ण माना जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसकी विधि कुछ अलग हो सकती है, इसलिए स्थानीय पंचांग या विद्वान आचार्य की सलाह के अनुसार कर्म करना उचित रहेगा।

