अंतरिक्ष में अब तक किसी सैटेलाइट को भेजने के बाद उसके ईंधन खत्म होने पर उसे बदलना बड़ी चुनौती रहा है। लेकिन अब चीन ऐसी तकनीक पर काम कर रहा है, जिससे अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट को दोबारा ईंधन देकर कई साल तक इस्तेमाल किया जा सकेगा। इसे अंतरिक्ष का पेट्रोल पंप कहा जा रहा है। अगर यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है, तो भविष्य में अंतरिक्ष अभियानों की लागत और सैटेलाइट संचालन का तरीका बदल सकता है।
अंतरिक्ष में कैसे काम करेगा यह पेट्रोल पंप?
पृथ्वी की कक्षा में हजारों सैटेलाइट अलग-अलग कामों में लगे हैं। कोई मोबाइल और इंटरनेट सेवाओं में मदद करता है, तो कोई मौसम की जानकारी, नेविगेशन और निगरानी के लिए इस्तेमाल होता है। इन सैटेलाइट्स के उपकरण लंबे समय तक काम कर सकते हैं, लेकिन उनकी दिशा और कक्षा नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल होने वाला ईंधन सीमित होता है।
जब ईंधन खत्म होने लगता है, तो सैटेलाइट को अपनी कक्षा में बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में उसे हटाकर नया सैटेलाइट भेजना पड़ सकता है। चीन इसी समस्या का समाधान खोज रहा है। उसकी योजना ऐसी सर्विसिंग तकनीक विकसित करने की है, जिसमें एक अंतरिक्ष यान दूसरे सैटेलाइट के पास पहुंचकर उसे ईंधन दे सके।
142 किलो ईंधन और आठ साल तक बढ़ सकती है उम्र
चीनी शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में दावा किया गया कि शिजियान-25 सैटेलाइट ने फरवरी 2025 में बेइदो-2 जी7 नेविगेशन सैटेलाइट में करीब 142 किलोग्राम ईंधन पहुंचाया। अध्ययन के मुताबिक, इससे संबंधित सैटेलाइट की परिचालन अवधि लगभग आठ साल तक बढ़ सकती थी।
हालांकि, इस खास रीफ्यूलिंग घटना की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। कुछ अंतरिक्ष ट्रैकिंग आंकड़ों के आधार पर इसके समय और सैटेलाइट्स की संभावित मुलाकात पर सवाल भी उठे हैं। इसलिए इस उपलब्धि को फिलहाल चीनी शोधकर्ताओं के दावे के रूप में देखना जरूरी है।
ऑक्टोपस जैसी रोबोटिक आर्म से मिलेगी मदद
इस तकनीक की सबसे दिलचस्प बात लचीली रोबोटिक आर्म है। चीन के युक्सिंग-3 06, जिसे हुकेदा-2 भी कहा जाता है, ने मार्च 2026 में अंतरिक्ष में ईंधन भरने से जुड़े परीक्षण किए। इसकी रोबोटिक आर्म ऑक्टोपस के हाथ की तरह मुड़ सकती है और लक्ष्य के निर्धारित कनेक्शन तक पहुंच सकती है।
इस प्रक्रिया में सर्विसिंग सैटेलाइट को दूसरे यान के पास पहुंचकर अपनी गति और स्थिति नियंत्रित करनी होती है। इसके बाद दोनों के बीच सुरक्षित संपर्क स्थापित किया जाता है, ताकि ईंधन स्थानांतरित किया जा सके। अंतरिक्ष में यह काम बेहद जटिल है, क्योंकि दोनों यान तेज गति से पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे होते हैं।
ध्यान देने वाली बात यह है कि रोबोटिक आर्म से जुड़े परीक्षण और दूसरे सैटेलाइट में ईंधन भरने का दावा अलग-अलग तकनीकी उपलब्धियां हैं; इन्हें एक ही सफल परीक्षण मानना सही नहीं होगा।
चीन के लिए क्यों अहम है यह तकनीक?
अंतरिक्ष में सैटेलाइट की मरम्मत और रीफ्यूलिंग सफल होने पर महंगे अंतरिक्ष उपकरणों को समय से पहले हटाने की जरूरत कम हो सकती है। इससे नए सैटेलाइट लॉन्च करने पर होने वाला खर्च घटाने और अंतरिक्ष में जमा हो रहे निष्क्रिय उपकरणों की समस्या से निपटने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, ऐसी तकनीक का इस्तेमाल केवल वैज्ञानिक और व्यावसायिक उद्देश्यों तक सीमित नहीं है। दूसरे सैटेलाइट के पास पहुंचने, उसकी स्थिति बदलने या उसे नियंत्रित करने की क्षमता के रणनीतिक और सैन्य पहलू भी हैं। इसी वजह से दुनिया की प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियां इन तकनीकों पर नजर रख रही हैं।

