अमेरिका में रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों के खिलाफ बड़ा कदम उठाया गया है। अमेरिकी सीनेट ने भारत समेत पांच देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने वाले एक प्रस्ताव को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। बिल के पक्ष में 86 सीनेटरों ने मतदान किया, जबकि 11 सांसद इसके विरोध में रहे। इस प्रस्ताव का सीधा असर भारत के साथ-साथ चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान पर पड़ सकता है।
हालांकि, अभी इसे अंतिम कानून नहीं माना जा सकता। सीनेट से मंजूरी मिलने के बाद बिल अब अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में जाएगा। वहां से पास होने के बाद इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के पास हस्ताक्षर के लिए भेजा जाएगा। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद ही यह कानून लागू हो सकेगा।
रूस पर लगाम लगाने की कोशिश
इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य रूस की ऊर्जा बिक्री से होने वाली आय को प्रभावित करना है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का मानना है कि रूस की तेल और गैस से होने वाली कमाई उसकी सैन्य गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक आधार प्रदान करती है। ऐसे में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाकर उसके तेल कारोबार को नुकसान पहुंचाने की रणनीति बनाई जा रही है।
इस बिल को खास बनाने वाली बात यह है कि इसे केवल एक पार्टी का समर्थन नहीं मिला है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों दलों के सांसदों ने इसके पक्ष में मतदान किया। इससे संकेत मिलता है कि रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने को लेकर अमेरिकी राजनीति में व्यापक सहमति मौजूद है।
500% टैरिफ का प्रस्ताव 100% तक पहुंचा
रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव पहली बार 23 जुलाई को सामने आया था। शुरुआती मसौदे में 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की बात कही गई थी। बाद में इसे संशोधित कर अधिकतम 100 प्रतिशत तक कर दिया गया।
अगर यह कानून लागू होता है तो अमेरिकी बाजार में प्रभावित देशों से आने वाले सामान पर भारी शुल्क लगाया जा सकता है। इससे संबंधित देशों और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों पर दबाव बढ़ने की संभावना है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
भारत इस प्रस्ताव के दायरे में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में रूस भारतीय रिफाइनरियों के लिए कच्चे तेल का प्रमुख स्रोत बन चुका है। जून 2026 में भारत ने रूस से प्रतिदिन करीब 26.1 लाख बैरल कच्चा तेल आयात किया। यह उस महीने भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 52.4 प्रतिशत था।
मई की तुलना में जून में रूस से भारत के तेल आयात में करीब 39 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसका मतलब है कि भारत की ऊर्जा जरूरतों में रूसी तेल की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो चुकी है। ऐसे में 100 प्रतिशत तक का संभावित अमेरिकी टैरिफ भारत के लिए आर्थिक और व्यापारिक चुनौती बन सकता है।
यूरोप के कुछ देशों को मिल सकती है राहत
प्रस्ताव में रूस से प्राकृतिक गैस खरीदने वाले कई देशों को भी ध्यान में रखा गया है। हालांकि, कुछ यूरोपीय देशों को राहत मिलने की संभावना है। जिन देशों की रूसी गैस पर निर्भरता कम है और जो लगातार अपनी निर्भरता घटाने की दिशा में कदम उठा रहे हैं, उन्हें प्रस्तावित टैरिफ से छूट मिल सकती है।
डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने भी संकेत दिया कि प्रस्ताव का मकसद अमेरिका के यूरोपीय सहयोगियों को निशाना बनाना नहीं है। इसके बजाय उन देशों पर दबाव बनाने की कोशिश है जो अभी भी रूस के ऊर्जा कारोबार को बड़े स्तर पर आर्थिक समर्थन दे रहे हैं।
ईरान से जुड़े कारोबार पर भी दबाव
बिल का प्रभाव केवल रूस तक सीमित नहीं है। इसके कानून बनने की स्थिति में 1996 के ईरान प्रतिबंध कानून को 2031 तक बढ़ाया जा सकता है। यह कानून उन गैर-अमेरिकी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने का आधार देता है जो ईरान के साथ कुछ प्रकार के कारोबार में शामिल हैं। इसके अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से आने वाले सामान पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का भी प्रस्ताव है। यह अधिकार पांच साल तक प्रभावी रहने की बात कही गई है।
ट्रम्प और अमेरिकी प्रतिनिधि सभा पर नज़र
सीनेट से बिल को मिली बड़ी मंजूरी के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में इसका क्या भविष्य होगा। अगर निचला सदन भी इसे मंजूरी देता है, तो अंतिम फैसला राष्ट्रपति ट्रम्प के हाथ में होगा।
भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना उसकी ऊर्जा रणनीति का अहम हिस्सा रहा है। यदि अमेरिका 100 प्रतिशत तक टैरिफ लागू करता है, तो इसका असर भारत-अमेरिका व्यापार और ऊर्जा लागत, रिफाइनिंग कारोबार साथ ही वैश्विक तेल बाजार पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल यह बिल कानून बनने की प्रक्रिया में है। आने वाले दिनों में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा और राष्ट्रपति ट्रम्प का रुख तय करेगा कि भारत समेत रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर प्रस्तावित भारी टैरिफ वास्तव में लागू होते हैं या नहीं या फिर यह प्रस्ताव राजनीतिक दबाव तक ही सीमित रह जाता है।

