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बारावफात’ आज, नबी की याद में होगी तक़रीर, जानिए ईद-ए-मिलाद-उन-नबी का इतिहास

बारावफात’ आज, नबी की याद में होगी तक़रीर, जानिए ईद-ए-मिलाद-उन-नबी का इतिहास

आज मुस्लिम समुदाय के लिए बेहद महत्वपूर्ण धार्मिक अवसर बारावफात मनाया जा रहा है। इसे ईद-ए-मिलाद-उन-नबी और मिलाद-उन-नबी के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन इस्लाम धर्म के अंतिम पैगंबर हजरत मुहम्मद के जीवन, जन्म और उनकी शिक्षाओं को याद करने से जुड़ा है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इस मौके पर धार्मिक कार्यक्रम, दुआ, नात और तकरीरें आयोजित की जाती हैं।

बारावफात आखिर क्या है?
ईद-ए-मिलाद-उन-नबी यानी बारावफात पैगंबर हजरत मुहम्मद के जन्म की स्मृति से जुड़ा धार्मिक अवसर है। इस दिन मुस्लिम समुदाय में उनके जीवन और उनके संदेशों को याद किया जाता है। पैगंबर के व्यक्तित्व और उनकी शिक्षाओं से जुड़े प्रसंगों को लोगों तक पहुंचाने के लिए धार्मिक सभाएं और तकरीरें आयोजित की जाती हैं। कई जगहों पर लोग नात पढ़ते हैं, दुआ करते हैं और कुरान की तिलावत के साथ धार्मिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं। इस अवसर का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि लोग पैगंबर की बताई गई इंसानियत, दया, करुणा, भाईचारे और जरूरतमंदों की मदद जैसी बातों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेते हैं।

कैसे तय होता है कब होगा बारावफात?
इस्लामी कैलेंडर चांद पर आधारित होता है और इसमें महीनों की शुरुआत चांद दिखाई देने के आधार पर होती है। ईद-ए-मिलाद-उन-नबी को आम तौर पर रबी अल-अव्वल महीने की 12वीं तारीख से जोड़ा जाता है। भारत में इस साल यह 26 अगस्त को पड़ा है। चांद आधारित कैलेंडर होने के कारण अलग-अलग देशों और क्षेत्रों में धार्मिक तारीखों में कभी-कभी एक दिन का अंतर देखने को मिलता है। इसलिए स्थानीय चांद की स्थिति और धार्मिक परंपराओं के अनुसार तारीख तय की जाती है। भारत में इस वर्ष 26 अगस्त को बारावफात या ईद-ए-मिलाद-उन-नबी का अवसर मनाया जा रहा है।

‘बारावफात’ नाम के पीछे क्या है वजह?
अब उस सवाल पर आते हैं, जो इस अवसर को सबसे ज्यादा खास बनाता है। आखिर इसे बारावफात क्यों कहा जाता है? ‘बारावफात’ नाम को रबी अल-अव्वल की 12वीं तारीख और ‘वफात’ शब्द से जोड़ा जाता है। ‘बारह’ यहां महीने की 12वीं तारीख की ओर संकेत करता है, जबकि ‘वफात’ का संबंध निधन से है। धार्मिक परंपराओं में पैगंबर हजरत मुहम्मद के जन्म और उनके निधन की स्मृति इसी तारीख से जोड़ी जाती है। इसी ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भ के कारण कई क्षेत्रों में ईद-ए-मिलाद-उन-नबी को ‘बारावफात’ के नाम से जाना जाता है। इस तरह ‘मिलाद’ शब्द जन्म की याद से जुड़ता है, जबकि ‘वफात’ पैगंबर के निधन की स्मृति की ओर संकेत करता है। दोनों संदर्भों के कारण इस अवसर के अलग-अलग नाम प्रचलित हुए।

कैसे हुई शुरुआत?
इतिहास में ईद-ए-मिलाद को मनाने की परंपरा के विकास को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं। मान्यता है कि पैगंबर मोहम्मद साहब का जन्म इस तीसरे महीने के 12 वें दिन हुआ था। इस दिन को मनाने की शुरुआत मिस्त्र से 11वीं सदी में हुई थी। फातिमिद वंश के सुल्तानों ने इसे मनाना शुरू किया। पैगंबर के इस दुनिया से जाने के चार सदियों बाद इसे त्योहार की तरह मनाया जाने लगा।

बारावफात पर क्या होता है?
बारावफात के मौके पर धार्मिक स्थलों और मस्जिदों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। लोग सामूहिक दुआ में शामिल होते हैं और पैगंबर के जीवन से जुड़े प्रसंगों को सुनते हैं। नात पढ़ने और धार्मिक तकरीरें करने की परंपरा भी कई जगहों पर देखने को मिलती है। कुछ क्षेत्रों में घरों और धार्मिक स्थलों को सजाया जाता है। कई जगहों पर लोगों के बीच मिठाइयां और भोजन बांटा जाता है। जरूरतमंद लोगों की सहायता करना भी इस अवसर के मानवीय संदेश से जुड़ा माना जाता है। हालांकि इन परंपराओं का तरीका हर जगह एक जैसा नहीं होता और स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार इसमें बदलाव देखने को मिलता है।

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