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आनंद गया, उत्सव बचा; हमने ख़ुशी को महसूस करना नहीं, बल्कि उसे प्रमाणित करना शुरू कर दिया

आनंद गया, उत्सव बचा; हमने ख़ुशी को महसूस करना नहीं, बल्कि उसे प्रमाणित करना शुरू कर दिया

मनीषा पांडेय। अठारहवीं सदी में यूरोप में एक अजीब बीमारी फैली थी – ‘railway spine’ । जब पहली बार रेलगाड़ी चली, तो हज़ारों लोगों ने शिकायत की कि उनकी रीढ़ में दर्द है, नींद नहीं आती, बेचैनी रहती है। डॉक्टर हैरान थे ,शरीर में कोई चोट नहीं थी। बाद में समझ आया कि यह शारीरिक बीमारी नहीं थी। यह उस झटके की प्रतिक्रिया थी जो एक नई तकनीक ने इंसानी मन को दिया था, वह तकनीक जो उनके जीने की रफ़्तार को हमेशा के लिए बदलने वाली थी।

आज हम फिर उसी मोड़ पर खड़ी हैं लेकिन इस बार रीढ़ में नहीं, हमारी भावों में दर्द है और यह दर्द इतना धीमा है, इतना सामान्य लगता है कि पता ही नहीं चला कब ख़ुशी एक अनुभव से एक परफॉर्मेंस में बदल गई। ख़ुशी को पहले भीतर उतरने का वक़्त मिलता था। अब वह बाहर जाने की जल्दी में है।

संस्कृत में एक शब्द है – ‘आनंद ‘ यह ख़ुशी का अनुवाद नहीं है, ख़ुशी किसी चीज़ से मिलती है .. तरक्की से, तारीफ से, तोहफे से पर आनंद बिना किसी कारण के होता है वह भीतर से उठता है। वह किसी को दिखाने की माँग नहीं करता। मीराबाई नाचती थीं , किसी दर्शकों के लिए नहीं। कबीर गाते थे, किसी रिकॉर्ड लेबल के लिए नहीं। वह अनुभव इतना भरा होता था कि उसे किसी बाहरी प्रमाण की ज़रूरत नहीं थी। आज ‘happiness’ तो खूब खोजते हैं , लेकिन ‘आनंद’ शब्द हमारी रोज़मर्रा की भाषा से लगभग गायब हो गया है और जब समाज से शब्द जाता है तो अनुभव भी चला जाता है।

यह महज़ एक सांस्कृतिक बदलाव नहीं है। यह एक सावधानीपूर्वक तैयार की गई अर्थव्यवस्था है। ‘happiness’ आज दुनिया का सबसे बड़ा उद्योग है – वेलनेस ऐप, मोटिवेशनल स्पीकर, लग्जरी यात्राएँ, फाइन डाइनिंग, सब मिलकर यह बेंच रहें हैं जैसे कि ख़ुशी एक उत्पाद है जिसे ख़रीदा जा सकता है और जो ख़रीदा जाए, वह दिखाया भी जाए, वरना निवेश का क्या मतलब? इस चक्र की सबसे चालाक बात यह है कि यह कभी पूरा नहीं होता। नया फ़ोन आया, पुराना बेकार लगा। नया रेस्तराँ खुला, पिछला फीका लगा। नई जगह ट्रेंड हुई, पिछली यात्रा छोटी लगी। अर्थशास्त्री इसे ‘hedonic treadmill’ कहते हैं, हम दौड़ते रहते हैं, जगह नहीं बदलती।

सोशल मीडिया ने एक और काम किया जो पहले संभव नहीं था। पहले इंसान अपने पड़ोस से तुलना करता था , दस-बीस घरों से और अब उस दुनिया के दायरे में पूरी दुनिया आ चुकी है ..चौबीसों घंटे और वह दुनिया ‘क्यूरेटेड’ है, ‘फ़िल्टर्ड’ है उसमें सिर्फ सबसे अच्छे पल हैं, सबसे सुंदर चेहरे हैं, सबसे बड़ी सफलताएँ हैं। मनोवैज्ञानिक Leon Festinger का ‘social comparison theory’ कहता है कि इंसान स्वाभाविक रूप से खुद को दूसरों से तौलता है, इसी से हम सीखते थे, बढ़ते थे लेकिन यह तुलना तब काम करती थी जब सामने वाला इंसान वास्तविक था। अब हम एक ऐसे इंसान से तुलना कर रहे हैं जो असल में मौजूद ही नहीं, बस एक ‘केयरफुली कंस्ट्रक्टेड डिजिटल परसोना’ है और उससे हारकर हम अपनी असली, भरी-पूरी ज़िंदगी को अधूरा मानने लगते हैं।

जापान में एक परंपरा है – ‘Shinrin-yoku’, जंगल के बीच बिना किसी उद्देश्य के बैठना..न फ़ोटो, न मेडिटेशन ऐप, न कोई कंटेंट। शोध बताते हैं कि इससे कॉर्टिसोल – तनाव का हार्मोन, सोलह प्रतिशत तक घटता है। व्यक्ति को एक अजीब-सी तृप्ति मिलती है जिसे वह शब्दों में वर्णित नहीं कर पाता क्योंकि वह अनुभव था किसी भी डिजिटल पोस्ट से बड़ा। हमारे यहाँ भी यह हमेशा से था – नदी किनारे बैठना, चाँद देखना, बारिश में भीगना, हरी घास पर लेटना, बिना किसी हड़बड़ी के लेकिन हमने इसे ‘समय की बर्बादी’ मान लिया, क्योंकि इसका कोई आउटपुट नहीं था, कोई कंटेंट नहीं बनता था।

हॉवर्ड यूनिवर्सिटी का पचासी साल पुराना एक अध्ययन है – ‘Harvard Study of Adult Development’ ,जो आज भी चल रहा है। सैकड़ों लोगों की पूरी ज़िंदगी को खंगाला गया। अमीर, गरीब, मशहूर, साधारण ..सबको। निष्कर्ष एक था, जो लोग सबसे खुश थे, सबसे लंबे जिए, सबसे स्वस्थ रहे – उनके पास एक चीज़ थी..पैसा नहीं, शोहरत नहीं, सफलता नहीं – गहरे, वास्तविक रिश्ते और गहरे रिश्ते वहाँ नहीं बनते जहाँ हर पल प्रदर्शन किया जाए। वे बनते हैं जहाँ कोई बिना फ़िल्टर के दिखे, जहां कोई सिर्फ पूछने के लिए हाल न पूछे, बल्कि जानने के लिए पूछे और पूछने के बाद हाल सुनने के लिए रुक सके। जहां खुशियां बाँट के बढ़ाई जा सकें और दुख को बांट के कम किया जाए।

एक बार अपनी नानी से पूछा था, “आपको अपनी ज़िंदगी का सबसे खुशी वाला पल कौन सा याद है?” उन्होंने बिना एक पल रुके कहा, जब तुम्हारे नाना बाज़ार से लौटते थे और चुपके से मेरे हाथ में इमली रख देते थे। कोई नहीं देखता था। बस हम दोनों जानते थे। कोई तस्वीर नहीं थी, कोई कैप्शन नहीं था, कोई लाइक नहीं था फिर भी वह पल इतने दशकों बाद भी उनकी आँखों में वैसा ही चमकता था, जैसे अभी हुआ हो। यही असली ख़ुशी पुरानी नहीं होती, वह धुंधली नहीं पड़ती। क्योंकि वह किसी एल्गोरिथम पर नहीं टिकी थी, वह भावों पर आधारित थी।

आज के समय में खुद के लिए जीना ..बिना दिखाए, बिना बताए, बिना प्रूफ़ किए, एक छोटी-सी क्रांति है। वह सूरज जो अकेले डूबते देखा और किसी को नहीं बताया। वह किताब जो रात को पढ़ी और कोई रिव्यू नहीं लिखा। वह हँसी जो किसी की बात पर आई और रील नहीं बनाई। वह खाना जो चुपचाप खाया और फोटोग्राफ नहीं लिया। ये सब क्षण – यही असली ज़िंदगी है।

जिस दिन हम यह समझ लेंगे कि जो दिखा नहीं वह भी हुआ, जो वायरल नहीं हुआ वह भी सुंदर था, जो किसी ने लाइक नहीं किया वह भी मायने रखता था, उस दिन आनंद वापस आएगा। जो बस हमारे भीतर कहीं दब गया है, उस शोर से, जो हमने खुद पैदा किए हैं। “आख़िर, ज़िंदगी जीने के लिए है, ना कि हर पल उसे साबित करने के लिए।”

 

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