नवरात्रि के पावन नौ दिनों में मां दुर्गा की आराधना का विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान भक्त माता रानी को प्रसन्न करने के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ, मंत्र जाप और पूजा-अर्चना करते हैं। हालांकि, व्यस्त दिनचर्या के कारण हर किसी के लिए प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती के सभी 700 श्लोकों का पाठ करना आसान नहीं होता। ऐसे में सिद्ध कुंजिका स्तोत्र को देवी उपासना का एक महत्वपूर्ण पाठ माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रुद्रयामल तंत्र में वर्णित शिव-पार्वती संवाद में कुंजिका स्तोत्र की महिमा बताई गई है। मान्यता है कि श्रद्धा और विधिपूर्वक इसका पाठ करने से दुर्गा सप्तशती के पाठ के समान फल प्राप्त हो सकता है।
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पढ़ने के फायदे
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ मन को एकाग्र करने, सकारात्मक भाव बनाए रखने और मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा बढ़ाने में सहायक माना जाता है। नवरात्रि में इसका नियमित पाठ भक्तों को आध्यात्मिक साधना से जोड़ता है। कई श्रद्धालु इसे देवी की कृपा, सुख-समृद्धि और जीवन में शांति की कामना के साथ पढ़ते हैं।
इस स्तोत्र में देवी के विभिन्न स्वरूपों की स्तुति के साथ बीज मंत्रों का उल्लेख मिलता है। भक्त अपनी आस्था और परंपरा के अनुसार इसका पाठ करते हैं।
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पढ़ने की विधि
नवरात्रि के दौरान सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ सुबह स्नान के बाद या शाम के समय किया जा सकता है। इसके लिए पूजा स्थल को साफ करके मां दुर्गा के सामने दीपक जलाएं। इसके बाद शांत मन से आसन पर बैठकर माता का ध्यान करें। पाठ करते समय जल्दबाजी न करें। मंत्रों और बीजाक्षरों का उच्चारण अपनी क्षमता के अनुसार स्पष्टता से करें।
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करते समय रखें ध्यान
धार्मिक परंपराओं में मंत्र साधना को श्रद्धा, संयम और सद्भाव के साथ करने पर जोर दिया जाता है। इसलिए इस स्तोत्र का उपयोग किसी को नुकसान पहुंचाने या गलत उद्देश्य से करने के बजाय देवी की आराधना और आत्मिक शांति के लिए करना चाहिए।
सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्
शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत॥1॥
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥2॥
कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥3॥
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्॥4॥
अथ मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं स: ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।
इति मंत्र
नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि॥1॥
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि॥2॥
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे।
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका॥3॥
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते।
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी॥4॥
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥5॥
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥6॥
हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥7॥
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा॥8॥
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥
इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥
यस्तु कुञ्जिकाया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥
इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम्।
॥ॐ तत्सत्॥

