लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीतियों पर काम तेज कर दिया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भी चुनाव से पहले अपने सियासी समीकरण मजबूत करने में जुटे हैं। पार्टी की नजर अब दलित समाज के विभिन्न वर्गों, धार्मिक परंपराओं और सामाजिक संगठनों पर है। ब्राह्मणों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिशों के साथ सपा अब दलित समुदाय के प्रभावशाली संतों और सामाजिक प्रतिनिधियों से संपर्क साधने की तैयारी कर रही है। माना जा रहा है कि इस पहल के जरिए पार्टी अपने PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) समीकरण को और मजबूती देना चाहती है।
दलित संतों और सामाजिक संस्थाओं तक पहुंचेगी सपा
समाजवादी पार्टी की अनुसूचित जाति (SC) इकाई ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम की योजना बनाई है। पार्टी की तैयारी के मुताबिक, 5 नवंबर को लखनऊ में एक बड़ा आयोजन किया जाएगा। इसमें उत्तर प्रदेश के अलावा पंजाब और हरियाणा से आने वाले दलित संतों को सम्मानित करने की योजना है। साथ ही संत रविदास, डॉ. भीमराव आंबेडकर और कांशीराम की विचारधारा से जुड़ी सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों को भी कार्यक्रम में आमंत्रित किया जाएगा।
इस आयोजन को केवल सम्मान समारोह के तौर पर नहीं, बल्कि दलित समाज के बीच राजनीतिक और सामाजिक संवाद बढ़ाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। पार्टी चाहती है कि समाज के प्रभावशाली लोगों के साथ संवाद स्थापित कर अपनी नीतियों और विचारों को व्यापक स्तर पर पहुंचाया जाए।
हर समुदाय को जोड़ना सपा की रणनीति
अखिलेश यादव की पार्टी की रणनीति का एक अहम पहलू दलित समाज के भीतर मौजूद अलग-अलग जातीय समूहों और धार्मिक परंपराओं तक पहुंच बनाना है। समनदास महाराज, कबीरपंथ और महर्षि वाल्मीकि परंपरा से जुड़े लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की योजना इसी दिशा में देखी जा रही है।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, दलित समाज के भीतर विभिन्न समुदायों की अपनी सामाजिक पहचान, परंपराएं और स्थानीय नेतृत्व है। ऐसे में इन वर्गों तक पहुंच बनाना किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनावी लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है। सपा की कोशिश है कि उसका सामाजिक आधार केवल कुछ चुनिंदा समूहों तक सीमित न रहे, दलित समाज के व्यापक हिस्से में भी पार्टी की पहुँच बढ़े।
लोकसभा चुनाव के नतीजों से बढ़ी सपा की उम्मीद
2024 के लोकसभा चुनाव ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई नए संकेत दिए थे। सपा और कांग्रेस के गठबंधन ने राज्य में कुल 43 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि बहुजन समाज पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। इन नतीजों के बाद दलित मतदाताओं के बीच राजनीतिक समर्थन को लेकर नए सिरे से चर्चा शुरू हुई।
समाजवादी पार्टी अब इसी बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में अपने लिए संभावनाएं तलाश रही है। पार्टी का प्रयास उन मतदाताओं तक पहुंचने का है, जो पहले बसपा का समर्थन करते थे या अब नए राजनीतिक विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। हालांकि, चुनाव में इन प्रयासों का कितना असर पड़ेगा, यह आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।
दलित प्रभावशाली चेहरों और इंफ्लुएंसर्स पर भी नजर
सपा की रणनीति में अब केवल चुनाव लड़ने वाले दलित नेताओं को आगे करना ही शामिल नहीं है। पार्टी सामाजिक प्रभाव रखने वाले व्यक्तियों, संतों, संस्थाओं और दलित समुदाय के बीच लोकप्रिय इंफ्लुएंसर्स से भी संपर्क बढ़ाना चाहती है। डिजिटल माध्यमों पर सक्रिय ऐसे लोगों की मदद से राजनीतिक संदेश को युवाओं और विभिन्न सामाजिक समूहों तक पहुंचाने की कोशिश की जा सकती है।
5 नवंबर के कार्यक्रम पर रहेंगी राजनीतिक निगाहें
सपा की SC इकाई के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल भारती के मुताबिक, लखनऊ में प्रस्तावित कार्यक्रम में अखिलेश यादव भी शामिल होंगे। आयोजन में उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा के दलित संतों तथा महापुरुषों की विचारधारा से जुड़ी संस्थाओं के प्रतिनिधियों को सम्मानित करने की योजना है।
अब देखना होगा कि समाजवादी पार्टी की यह पहल 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उसके PDA अभियान को कितनी मजबूती देती है। दलित समाज के विभिन्न वर्गों के साथ संवाद बढ़ाने की यह रणनीति सपा के लिए नए सामाजिक समीकरण बनाने का अवसर बन सकती है। वहीं, इसका चुनावी लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टी अपने प्रयासों को जमीनी स्तर पर कितना प्रभावी बना पाती है।

