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SC में JPC की बैठक रद्द जजों के साथ होनी थी चर्चा। जानिए क्या है पूरा मामला

SC में JPC की बैठक रद्द जजों के साथ होनी थी चर्चा। जानिए क्या है पूरा मामला

देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव यानी ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। इस मुद्दे पर विचार कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के सदस्यों और सुप्रीम कोर्ट के कुछ वरिष्ठ न्यायाधीशों के बीच प्रस्तावित अनौपचारिक बैठक को रद्द कर दिया गया है।JPC के चेयरमैन और बीजेपी सांसद पी.पी. चौधरी ने सोमवार को इस पूरे घटनाक्रम पर जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से पहले समिति के सदस्यों के साथ अनौपचारिक बातचीत के लिए समय तय किया गया था, लेकिन बाद में अदालत ने बैठक को उचित नहीं माना और इसे रद्द कर दिया।हालांकि, बैठक रद्द होने से पहले ही इस प्रस्ताव को लेकर विपक्षी सांसदों की ओर से सवाल उठने लगे थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की ओर से बैठक रद्द करने का आधिकारिक आधार यह बताया गया कि प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन भविष्य में न्यायिक समीक्षा का विषय बन सकता है।

कैसे शुरू हुआ पूरा मामला?

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से जुड़े विधेयकों की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के साथ अनौपचारिक बातचीत का सुझाव दिया गया था।रिपोर्टों के मुताबिक, यह विचार DMK के राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील पी. विल्सन की ओर से सामने आया था। विल्सन ने समिति के भीतर इस विषय पर चर्चा की थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के साथ बैठक को लेकर बातचीत आगे बढ़ी।
इस बैठक का उद्देश्य अदालत से किसी तरह की न्यायिक राय या फैसला लेना नहीं था, बल्कि संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर न्यायाधीशों के अनुभव और विशेषज्ञता को समझना बताया गया था।

कब-कब क्या हुआ?
इस मामले में बैठक को लेकर कई चरणों में पत्राचार हुआ।

18 सितंबर: लोकसभा सचिवालय की ओर से सुप्रीम कोर्ट के महासचिव को बैठक के संबंध में पत्र भेजा गया।

22 सितंबर: सुप्रीम कोर्ट की ओर से प्रस्तावित बैठक को लेकर जवाब दिया गया और 6 अक्टूबर शाम 4:30 बजे बातचीत के लिए समय तय किए जाने की जानकारी दी गई।

23 सितंबर: लोकसभा सचिवालय ने प्रस्तावित दौरे और बैठक की पुष्टि की।
बैठक में करीब 35 सांसदों और 6 अधिकारियों के शामिल होने की तैयारी की गई थी। इसके बाद समिति से जुड़े दस्तावेज भी सुप्रीम कोर्ट को भेजे गए।

28 सितंबर: संबंधित दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट को उपलब्ध कराए गए।

1 अक्टूबर: सुप्रीम कोर्ट की ओर से समिति को सूचित किया गया कि वरिष्ठ न्यायाधीशों ने इस प्रस्ताव पर विचार किया है और बैठक को आगे बढ़ाना उचित नहीं माना गया।

इस तरह 6 अक्टूबर को प्रस्तावित बैठक होने से पहले ही उसे रद्द कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने बैठक क्यों रद्द की?

सुप्रीम कोर्ट की ओर से बैठक रद्द करने के पीछे मुख्य वजह यह बताई गई कि ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से जुड़े प्रस्तावित संवैधानिक बदलाव भविष्य में न्यायिक समीक्षा के लिए अदालत के सामने आ सकते हैं।ऐसे में इस विषय पर संसदीय समिति के सदस्यों के साथ न्यायाधीशों की अनौपचारिक बातचीत को उचित नहीं माना गया।
यानी आधिकारिक तौर पर बैठक रद्द करने की वजह विपक्षी सांसदों का विरोध नहीं बताया गया है। हालांकि, बैठक को लेकर विपक्ष की ओर से सवाल जरूर उठाए गए थे।प्रस्तावित बैठक को लेकर वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने भी आपत्ति जताई थी।
उनका सवाल था कि जिस कानून की संवैधानिक वैधता भविष्य में सुप्रीम कोर्ट के सामने चुनौती बन सकती है, उस कानून पर विचार कर रही संसदीय समिति के सदस्यों और मौजूदा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के बीच अनौपचारिक बातचीत कितनी उचित होगी।विपक्ष की आपत्ति मुख्य रूप से न्यायपालिका की स्वतंत्रता और शक्तियों के पृथक्करण यानी Separation of Powers से जुड़ी थी।वहीं JPC चेयरमैन पी.पी. चौधरी ने बैठक के प्रस्ताव का बचाव किया।उनका कहना था कि संसद की समितियों और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के बीच बातचीत का पहले भी उदाहरण रहा है। उनका तर्क है कि संवैधानिक मामलों पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के लंबे अनुभव और विशेषज्ञता को समझना संसदीय समिति के लिए उपयोगी हो सकता है।चौधरी ने यह भी संकेत दिया कि प्रस्तावित बातचीत का उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट से किसी विधेयक पर फैसला या आधिकारिक कानूनी राय लेना नहीं था। इसे एक अनौपचारिक संवाद के तौर पर देखा गया था।

पी. विल्सन ने क्यों दिया था बैठक का सुझाव?

DMK सांसद और वरिष्ठ वकील पी. विल्सन इस प्रस्ताव के पीछे प्रमुख नामों में हैं।
विल्सन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों से बातचीत का सुझाव व्यापक संवैधानिक समझ के उद्देश्य से दिया गया था। उनका तर्क था कि न्यायाधीशों के अनुभव से संवैधानिक प्रावधानों और उनके संभावित प्रभावों को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।
विल्सन ने यह भी स्पष्ट किया कि DMK पहले से ही ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के प्रस्ताव का विरोध करती रही है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों से बातचीत का सुझाव देना पार्टी के राजनीतिक रुख में बदलाव नहीं है।

किन विधेयकों की जांच कर रही है JPC?

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को लागू करने के लिए केंद्र सरकार ने दिसंबर 2024 में दो प्रमुख विधेयक लोकसभा में पेश किए थे। इन्हें आगे की जांच और विचार-विमर्श के लिए संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया।

इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

1. Constitution (129th Amendment) Bill, 2024

2. Union Territories Laws (Amendment) Bill, 2024

इन प्रस्तावों का मकसद देश में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने के लिए मौजूदा संवैधानिक और कानूनी ढांचे में बदलाव करना है।

सरकार का क्या तर्क है?

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के समर्थकों का तर्क है कि देश में बार-बार चुनाव होने से सरकारी मशीनरी, सुरक्षा बलों और प्रशासन पर लगातार दबाव रहता है। चुनावों के दौरान आदर्श आचार संहिता लागू होने से कई सरकारी योजनाओं और नीतिगत फैसलों की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा चुनावी खर्च कम करने और प्रशासनिक संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल को भी इसके पक्ष में प्रमुख तर्क माना जाता है।

विपक्ष क्यों कर रहा है विरोध?

विपक्षी दलों का कहना है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने से राज्यों की राजनीतिक और संवैधानिक भूमिका प्रभावित हो सकती है।विपक्ष की एक बड़ी चिंता यह भी है कि अगर किसी राज्य की विधानसभा का कार्यकाल किसी कारण से समय से पहले खत्म हो जाता है या किसी सरकार के पास बहुमत नहीं रहता, तो एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था को लागू करना संवैधानिक रूप से जटिल हो सकता है।
यही वजह है कि इस प्रस्ताव को लेकर संसद में राजनीतिक और संवैधानिक दोनों स्तरों पर बहस जारी है।

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट के साथ प्रस्तावित बैठक रद्द होने के बावजूद ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर संसदीय समिति का काम नहीं रुका है। JPC अलग-अलग पक्षों, विशेषज्ञों और हितधारकों की राय लेकर विधेयकों के संवैधानिक, कानूनी और व्यावहारिक पहलुओं की जांच कर रही है।
फिलहाल इस पूरे विवाद ने एक अहम सवाल जरूर खड़ा किया है—क्या संसद की किसी समिति को ऐसे संवैधानिक प्रस्ताव पर सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीशों के साथ अनौपचारिक बातचीत करनी चाहिए, जिसकी संवैधानिक वैधता भविष्य में अदालत के सामने आ सकती है?
सुप्रीम कोर्ट की ओर से बैठक रद्द किए जाने के बाद यह बहस अब संसद और न्यायपालिका के बीच संस्थागत सीमाओं और संवाद के तरीके को लेकर भी आगे बढ़ती दिखाई दे रही है।

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