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सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसा: 6 मौतों के बाद जागा प्रशासन, MCD ने आसपास की इमारतें खाली कराईं

सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसा: 6 मौतों के बाद जागा प्रशासन, MCD ने आसपास की इमारतें खाली कराईं

दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार यानी 6 सितंबर की दोपहर एक पांच मंजिला इमारत अचानक भरभराकर गिर गई। दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास छात्र-छात्राओं से भरे रहने वाले इस इलाके में हादसे के बाद ऐसा मंजर था कि कुछ ही सेकंड में पूरी इमारत मलबे के ढेर में बदल गई। शुरुआत में कई लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका जताई गई और जैसे-जैसे राहत एवं बचाव अभियान आगे बढ़ा, मौतों का आंकड़ा भी बढ़ता गया। सोमवार सुबह तक 6 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी थी, जबकि कई घायलों का इलाज चल रहा है और राहत दल मलबे की जांच में जुटे रहे।

हादसे के बाद अब सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इमारत क्यों गिरी, बल्कि यह भी है कि एक ऐसी इमारत में बड़ी संख्या में छात्र कैसे रह रहे थे, जिसे लेकर निर्माण नियमों के उल्लंघन की जानकारी सामने आ रही है।

रविवार दोपहर अचानक मचा हड़कंप
सत्य निकेतन की एक संकरी गली में स्थित इस इमारत को ‘हॉस्टल डेज’ के नाम से बताया जा रहा है। यह एक प्राइवेट पीजी के तौर पर इस्तेमाल हो रही थी और यहां दिल्ली विश्वविद्यालय के आसपास के कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र रहते थे। रविवार दोपहर करीब 1:30 बजे अचानक इमारत धराशायी हो गई। स्थानीय लोगों के मुताबिक, गिरने के समय आसपास रहने वालों को तेज आवाज के साथ ऐसा झटका महसूस हुआ, जैसे जमीन हिल गई हो। देखते ही देखते जिस इमारत में कुछ देर पहले तक छात्रों की आवाजाही थी, वहां ईंट, लोहे और कंक्रीट का मलबा फैल गया। आसपास के लोग मदद के लिए दौड़े और पुलिस, दमकल तथा आपदा राहत टीमों ने मोर्चा संभाल लिया।

मलबे में अपनों को खोजते रहे परिवार
हादसे की सबसे दर्दनाक तस्वीर उन परिवारों की रही जो अपने बच्चों की तलाश में अस्पतालों और घटनास्थल के बीच भटकते नजर आए। एक छात्र पवन की बहन प्रियांशी अपने भाई को खोजने के लिए अस्पताल पहुंचीं। बताया गया कि पवन करीब एक महीने पहले ही यहां रहने आया था और कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई कर रहा था। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस इमारत में करीब 15 कमरे थे और कई कमरों में दो से तीन छात्र रहते थे। यहां रहने वाले छात्र अलग-अलग राज्यों से आकर दिल्ली में पढ़ाई कर रहे थे। कुछ छात्रों के मोतीलाल नेहरू कॉलेज, आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज और श्री वेंकटेश्वर कॉलेज में पढ़ने की जानकारी सामने आई है।

एक स्थानीय निवासी ने बताया कि ऊपरी मंजिलों पर बड़ी संख्या में छात्र रह रहे थे। हादसे के वक्त कुछ लोग सो रहे थे। एक प्रत्यक्षदर्शी के मुताबिक, वह इमारत गिरने से कुछ मिनट पहले ही बाहर निकल पाया था।

बेसमेंट का काम और पानी बना सवाल
हादसे के बाद इमारत की मजबूती को लेकर कई सवाल खड़े हुए हैं। स्थानीय लोगों ने दावा किया कि बेसमेंट में मरम्मत या निर्माण से जुड़ा काम चल रहा था और वहां पानी भी जमा था। उनका कहना है कि लगातार बारिश के बाद बेसमेंट में पानी भरने से नींव कमजोर हुई होगी और इसी दौरान किए जा रहे काम ने स्थिति को और खतरनाक बना दिया।

हालांकि एमसीडी ने शुरुआत में साफ कहा कि मलबा हटाए जाने से पहले यह निश्चित रूप से कहना मुश्किल है कि हादसे के वक्त बेसमेंट में किस तरह का काम चल रहा था। प्रशासन की जांच में अब निर्माण और मरम्मत से जुड़े पहलुओं को भी देखा जा रहा है।

नियमों से ज्यादा मंजिलें, फिर भी कैसे चलता रहा पीजी?
इस हादसे का सबसे गंभीर पहलू इमारत के निर्माण से जुड़े नियम हैं। एमसीडी अधिकारियों के मुताबिक, करीब 55 वर्ग गज के प्लॉट पर बनी इस इमारत को सिर्फ ग्राउंड फ्लोर और पहली मंजिल तक निर्माण की अनुमति थी, लेकिन मौके पर इससे कहीं ज्यादा मंजिलें बनी हुई थीं। यानी जिस संरचना को सीमित निर्माण की अनुमति मिली थी, वह आगे चलकर बहुमंजिला पीजी में बदल गई।

एमसीडी के शुरुआती आकलन में इमारत के निर्माण और बेसमेंट में हुए काम को लेकर भी गंभीर सवाल सामने आए हैं। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर निर्माण नियमों का उल्लंघन हुआ था, तो ऐसी इमारत प्रशासन की निगरानी से कैसे बचती रही?

बगल की इमारत भी मिली खतरनाक
हादसे के बाद प्रशासन ने सिर्फ मलबे वाली जगह तक कार्रवाई सीमित नहीं रखी। आसपास की इमारतों की सुरक्षा भी जांची गई। ढही हुई बिल्डिंग से लगी एक इमारत को जर्जर और खतरनाक पाए जाने के बाद खाली कराया गया और उसे सील कर दिया गया। वहां रहने वाले लोगों को नजदीकी सामुदायिक भवन में भेजा गया। सोमवार को एमसीडी ने बगल की एक खतरनाक इमारत को गिराने की प्रक्रिया भी शुरू करने का आदेश दिया। अधिकारियों के मुताबिक, संपत्ति संख्या 13 को तीन दिन के भीतर गिराने का निर्देश दिया गया है और ऐसा नहीं करने पर निगम खुद कार्रवाई कर सकता है।

इसके अलावा आसपास की कुछ इमारतों को लोहे के खंभों से सहारा दिया गया है। जिन भवनों में दरार या कमजोरी की आशंका है, वहां सुरक्षा के लिहाज से लोगों को हटाने और संरचनात्मक जांच की जा रही है।

6 मौतों के बाद MCD का बड़ा एक्शन
रविवार की रात तक जहां बचाव अभियान प्राथमिकता था, वहीं सोमवार को प्रशासन के सामने अवैध निर्माण पर कार्रवाई की चुनौती भी खड़ी हो गई। एमसीडी ने चार से ज्यादा मंजिल वाले अवैध निर्माणों को तत्काल सील करने के आदेश दिए हैं। साथ ही उन अधिकारियों पर भी सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी गई है, जिनकी भूमिका अवैध निर्माण को अनुमति देने या नजरअंदाज करने में पाई जाएगी। दिल्ली पुलिस ने भी इमारत के मालिक के खिलाफ मामला दर्ज किया है। दिल्ली सरकार ने घटना की जांच के आदेश दिए हैं, जबकि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने घटनास्थल और अस्पताल जाकर स्थिति का जायजा लिया।

हाई कोर्ट तक पहुंचा मामला
सत्य निकेतन हादसे की गंभीरता को देखते हुए मामला दिल्ली हाई कोर्ट तक भी पहुंच गया है। सोमवार को एक वकील ने मुख्य न्यायाधीश के सामने इस घटना का उल्लेख करते हुए तत्काल सुनवाई की मांग की। अदालत ने मामले को उसी दिन सुनने पर सहमति जताई। इससे साफ है कि अब हादसे की जिम्मेदारी केवल बिल्डिंग मालिक तक सीमित नहीं रहने वाली। निर्माण की अनुमति, पीजी के तौर पर इस्तेमाल, सुरक्षा मानकों और स्थानीय प्रशासन की निगरानी जैसे सवाल भी जांच के दायरे में आ सकते हैं।

एलजी ने बुलाई बैठक, कई एजेंसियां होंगी शामिल
हादसे के बाद दिल्ली के उपराज्यपाल ने भी बैठक बुलाई है। इसमें दिल्ली सरकार, एमसीडी, डीडीए, दिल्ली पुलिस समेत संबंधित एजेंसियों के अधिकारियों के शामिल होने की बात सामने आई है। बैठक में राजधानी के ऐसे इलाकों की सुरक्षा व्यवस्था और अवैध निर्माण पर कार्रवाई को लेकर बड़े फैसले लिए जाने की संभावना है।

उधर, हादसे के बाद छात्र संगठनों में भी नाराजगी देखने को मिली। एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने एमसीडी कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया और छात्र पीजी की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए। प्रदर्शन के दौरान हंगामा और तोड़फोड़ की स्थिति भी बनी तथा कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।

हादसे के बाद निगरानी क्यूँ?
सत्य निकेतन की घटना सिर्फ एक इमारत के गिरने की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था पर सवाल है जिसमें दिल्ली जैसे शहर में पढ़ाई करने आए छात्र ऐसी इमारतों में रहने को मजबूर होते हैं, जहां सुरक्षा से ज्यादा महत्व कई बार जगह और किराये को दिया जाता है। सत्य निकेतन वर्षों में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के बड़े आवासीय केंद्र के रूप में विकसित हुआ है। छोटे प्लॉटों पर बने पुराने मकान धीरे-धीरे पीजी और हॉस्टल में बदलते गए और कई जगहों पर निर्माण का स्वरूप मूल स्वीकृति से काफी आगे निकल गया।

अब प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि कुछ इमारतों को सील करने या हादसे के बाद कुछ लोगों पर कार्रवाई करने से आगे बढ़कर पूरे इलाके का सुरक्षा ऑडिट किया जाए। क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि सत्य निकेतन में इमारत क्यों गिरी, बल्कि यह भी है कि दिल्ली में ऐसी कितनी इमारतें हैं जो अगली बारिश, अगली खुदाई या अगले कमजोर निर्माण का इंतजार कर रही हैं।

मलबे से जिंदगी बचाने की कोशिश रविवार शाम से सोमवार तक चलती रही, लेकिन इस हादसे ने दिल्ली के छात्र इलाकों की सुरक्षा का जो सवाल खड़ा किया है, उसका जवाब सिर्फ बुलडोजर, सीलिंग और गिरफ्तारी से नहीं मिलेगा। असली बदलाव तभी होगा, जब अवैध निर्माण हादसे से पहले पहचाने जाएं और लोगों को सुरक्षित रहने की जगह हादसे के बाद नहीं, उससे पहले दी जाए।

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