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होर्मुज़ स्ट्रेट खोलने के बदले ईरान की 6 शर्तें, अमेरिका के सामने बढ़ी बड़ी चुनौती

होर्मुज़ स्ट्रेट खोलने के बदले ईरान की 6 शर्तें, अमेरिका के सामने बढ़ी बड़ी चुनौती

ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे तनाव के बीच दुनिया की नजर एक बार फिर होर्मुज़ स्ट्रेट पर टिक गई है। यह समुद्री मार्ग पश्चिम एशिया के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में इसके पूरी तरह खुलने या बंद रहने का सीधा असर कच्चे तेल, गैस और वैश्विक बाजारों पड़ता है।

अब ईरान ने साफ संकेत दिया है कि होर्मुज़ स्ट्रेट को पूरी तरह खोलना केवल सैन्य या समुद्री फैसला नहीं होगा, बल्कि इसके लिए अमेरिका को कई शर्तें पूरी करनी होंगी। ईरान के सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहम्मद बाघेर जोलघदर की ओर से सामने रखी गई मांगों में अमेरिकी सैन्य नाकाबंदी खत्म करने से लेकर प्रतिबंध हटाने और युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई तक की बातें शामिल हैं।

ट्रंप का बदला हुआ फोकस क्या है?
रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब ईरान के साथ संघर्ष खत्म करने के लिए केवल परमाणु समझौते पर निर्भर रहने के बजाय दूसरे विकल्पों पर भी विचार कर रहे हैं। इनमें होर्मुज़ स्ट्रेट से सामान्य व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही बहाल करना अहम मुद्दा बनकर सामने आया है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप के लिए स्ट्रेट का दोबारा खुलना संघर्ष से बाहर निकलने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हो सकता है।

लेकिन समस्या यह है कि अमेरिका जहां होर्मुज़ को फिर से खोलने पर जोर दे रहा है, वहीं ईरान इसके बदले व्यापक राजनीतिक और आर्थिक रियायतें मांग रहा है।

ईरान की पहली शर्त-युद्ध और सैन्य कार्रवाई का अंत
ईरान की सबसे अहम मांगों में युद्ध को स्थायी रूप से समाप्त करना शामिल है। तेहरान चाहता है कि अमेरिका ईरान और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई तथा सैन्य दबाव को खत्म करे। ईरान का तर्क है कि जब तक उसके खिलाफ सैन्य खतरा बना रहेगा, तब तक होर्मुज़ को पूरी तरह सामान्य स्थिति में लाना आसान नहीं होगा। यही वजह है कि समुद्री मार्ग खोलने का मुद्दा अब व्यापक युद्धविराम और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ गया है।

दूसरी शर्त-अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटे
ईरान ने अमेरिका से उसकी नौसैनिक नाकाबंदी खत्म करने की मांग भी की है। तेहरान का कहना है कि अमेरिकी नौसैनिक दबाव हटने के बाद ही समुद्री व्यापार को सामान्य तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है। यह मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि होर्मुज़ से जुड़े किसी भी समझौते में केवल ईरान की कार्रवाई ही नहीं, बल्कि अमेरिकी सैन्य तैनाती और समुद्री गतिविधियां भी अहम भूमिका निभाती हैं।

तीसरी शर्त-क्षेत्र से अमेरिकी सैनिकों की वापसी
ईरान चाहता है कि अमेरिका उसके आसपास के क्षेत्र से अपनी सैन्य मौजूदगी कम करे और सैनिकों की वापसी की दिशा में कदम उठाए। तेहरान इसे अपनी सुरक्षा से जोड़कर देखता है। दूसरी ओर, अमेरिका के लिए पश्चिम एशिया में सैन्य मौजूदगी उसकी क्षेत्रीय रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए इस मांग पर दोनों पक्षों के बीच सहमति बनना आसान नहीं माना जा रहा।

चौथी शर्त-ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाए जाएं
ईरान की एक बड़ी मांग अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने की है। लंबे समय से लगाए गए प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था, तेल निर्यात और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेनदेन पर दबाव बनाया है। अगर अमेरिका प्रतिबंधों में बड़ी राहत देता है, तो इससे ईरान को आर्थिक रूप से फायदा मिल सकता है। लेकिन वॉशिंगटन के लिए प्रतिबंध हटाना एक बड़ा राजनीतिक फैसला होगा, खासकर तब जब परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी बनी हुई है।

पांचवीं शर्त-विदेशों में जमा ईरानी संपत्तियां रिलीज हों
ईरान ने विदेशों में फ्रीज की गई अपनी संपत्तियों को जारी करने की मांग भी रखी है। ऐसी संपत्तियों तक पहुंच बहाल होने से तेहरान को आर्थिक राहत मिल सकती है। यह मुद्दा भी किसी संभावित समझौते में महत्वपूर्ण सौदेबाजी का हिस्सा बन सकता है। अमेरिका के लिए संपत्तियां रिलीज करना और ईरान के लिए होर्मुज़ खोलना – दोनों कदमों को एक-दूसरे से जोड़कर देखा जा सकता है।

छठी शर्त-युद्ध के नुकसान का मुआवजा
ईरान ने संघर्ष के दौरान हुए नुकसान की भरपाई की मांग भी की है। तेहरान चाहता है कि युद्ध और सैन्य हमलों से हुए नुकसान के लिए उसे मुआवजा दिया जाए। यही मांग बातचीत को सबसे कठिन बना सकती है, क्योंकि अमेरिका के लिए सीधे तौर पर युद्ध क्षतिपूर्ति स्वीकार करना बड़ा राजनीतिक और कूटनीतिक कदम होगा।

ईरान के सहयोगी संगठनों पर हमले भी रोकने की मांग
ईरान की मांगों में क्षेत्र में उसके सहयोगी संगठनों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई रोकने की बात भी सामने आई है। इसका मतलब यह है कि होर्मुज़ को लेकर संभावित समझौता केवल ईरान और अमेरिका के बीच समुद्री व्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति से जुड़ सकता है।

होर्मुज़ इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
होर्मुज़ स्ट्रेट फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। इसकी भौगोलिक स्थिति बेहद संवेदनशील है। दुनिया के बड़े ऊर्जा व्यापार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। यही कारण है कि यहां तनाव बढ़ते ही अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में हलचल शुरू हो जाती है। जहाजों की आवाजाही बाधित होने पर तेल और LNG की आपूर्ति पर दबाव बढ़ता है, जिससे दुनिया के कई देशों में ईंधन की कीमतें प्रभावित हो जाती हैं।

ईरान के पास कितना रणनीतिक दबदबा है?
होर्मुज़ का उत्तरी किनारा ईरान से जुड़ा है और दक्षिणी हिस्सा ओमान के तट से संबंधित है। सबसे संकरे हिस्से में इसकी चौड़ाई करीब 21 नॉटिकल मील यानी लगभग 39 किलोमीटर बताई जाती है। इसी भौगोलिक स्थिति की वजह से ईरान इस जलमार्ग पर महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रभाव रखता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ईरान अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत पूरे जलमार्ग पर मनमाना नियंत्रण स्थापित कर सकता है। समुद्री आवाजाही अंतरराष्ट्रीय नियमों और ट्रांजिट व्यवस्था से भी जुड़ी हुई है।

मिसाइल, ड्रोन और क्षेत्रीय नेटवर्क से मजबूत स्थिति
अमेरिका के सामने ईरान की चुनौती केवल होर्मुज़ तक सीमित नहीं है। ईरान के पास बड़ी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता, ड्रोन तकनीक और क्षेत्रीय सहयोगी नेटवर्क मौजूद हैं। यही वजह है कि किसी भी सैन्य समाधान में अमेरिका को केवल ईरान की मुख्य भूमि ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र में संभावित प्रतिक्रिया को ध्यान में रखना होगा। इसी कारण कूटनीतिक रास्ता दोनों पक्षों के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है।

परमाणु समझौते के बिना खत्म हो सकती है जंग?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल है। अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम लंबे समय से विवाद का केंद्रीय मुद्दा रहा है। लेकिन अगर वाशिंगटन के लिए होर्मुज़ को खोलना तत्काल प्राथमिकता बनता है, तो परमाणु समझौते से अलग किसी अंतरिम व्यवस्था की संभावना पर चर्चा बढ़ सकती है।

हालांकि, ऐसी व्यवस्था कितनी टिकाऊ होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों देश सुरक्षा, प्रतिबंध, सैन्य तैनाती और परमाणु गतिविधियों को लेकर किस तरह की गारंटी स्वीकार करते हैं।

होर्मुज पर राजनीति
फिलहाल होर्मुज़ स्ट्रेट का भविष्य अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली कूटनीतिक बातचीत पर निर्भर करता दिखाई दे रहा है। ईरान ने अपनी मांगें स्पष्ट कर दी हैं, जबकि अमेरिका के लिए इन सभी शर्तों को स्वीकार करना आसान नहीं होगा। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे से पहले रियायत की उम्मीद कर रहे हैं। ईरान चाहता है कि अमेरिका पहले सैन्य और आर्थिक दबाव कम करे, जबकि अमेरिका होर्मुज़ की सुरक्षित और सामान्य आवाजाही को अपनी प्राथमिकता मान रहा है।

अगर दोनों देशों के बीच कोई समझौता होता है और होर्मुज़ से व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही पूरी तरह सामान्य होती है, तो वैश्विक तेल बाजार, शिपिंग लागत और ऊर्जा सुरक्षा को राहत मिल सकती है। लेकिन अगर बातचीत विफल होती है, तो होर्मुज़ एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील केंद्र बन सकता है।

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