लखनऊ। राजधानी लखनऊ में साइबर ठगी के खिलाफ पुलिस को बड़ी कामयाबी मिली है। अलीगंज थाना पुलिस ने रिध्या प्लाजा में संचालित कथित अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड कॉल सेंटर का पर्दाफाश करते हुए 16 लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, पकड़े गए लोगों में 12 पुरुष और 4 महिलाएं शामिल हैं। मौके से बड़ी संख्या में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी बरामद किए गए हैं, जिनमें 36 लैपटॉप, 22 हेडफोन, 32 लैपटॉप चार्जर, 5 राउटर, 20 माउस और 20 मोबाइल फोन शामिल हैं।
पुलिस का कहना है कि यह कॉल सेंटर मुख्य रूप से अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाकर साइबर ठगी करता था। आरोपियों ने ठगी के लिए बाकायदा अलग-अलग टीमों का ढांचा तैयार कर रखा था। इस नेटवर्क में एजेंट, वेरिफायर और क्लोजर टीम के जरिए कथित तौर पर पीड़ितों को फंसाने से लेकर उनसे रकम वसूलने तक का काम किया जाता था।
सुबह 4 बजे संदिग्ध गतिविधि से खुला राज
पुलिस के अनुसार, 18 सितंबर की सुबह करीब 4 बजे अलीगंज पुलिस इलाके में गश्त और चेकिंग कर रही थी। इसी दौरान रिध्या प्लाजा के पास पुलिस को एक संदिग्ध व्यक्ति दिखाई दिया। पूछताछ में उसने बताया कि वह प्लाजा में काम करता है। हालांकि, समय असामान्य होने के कारण पुलिस को उसकी गतिविधियों पर संदेह हुआ।
इसके बाद पुलिस टीम ने रिध्या प्लाजा स्थित परिसर की जांच शुरू की। अतिरिक्त पुलिस बल के पहुंचने के बाद जब वहां विस्तृत चेकिंग की गई तो एक कॉल सेंटर संचालित मिला। पुलिस के मुताबिक, जांच आगे बढ़ने पर कॉल सेंटर से साइबर फ्रॉड किए जाने की जानकारी सामने आई। इसके बाद मौके से 16 लोगों को हिरासत में लेकर गिरफ्तार किया गया। मामले में अलीगंज थाने में BNS की विभिन्न धाराओं और आईटी एक्ट की धाराओं 66सी तथा 66डी के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
फर्जी पॉप-अप से शुरू होता था पूरा खेल
पुलिस की पूछताछ में सामने आए कथित तरीके के मुताबिक, गिरोह सबसे पहले अमेरिकी नागरिकों के कंप्यूटर पर फर्जी पॉप-अप या सिक्योरिटी वार्निंग दिखाता था। स्क्रीन पर इस तरह का संदेश दिखाई देता था, जिससे यूजर को लगता था कि उसके कंप्यूटर में वायरस आ गया है या कोई गंभीर तकनीकी अथवा सुरक्षा समस्या पैदा हो गई है। इसके बाद पॉप-अप में दिए गए विकल्प पर क्लिक करने या बताए गए नंबर पर संपर्क करने के बाद पीड़ित की कॉल कथित कॉल सेंटर तक पहुंचती थी। यहां मौजूद एजेंट खुद को माइक्रोसॉफ्ट कंपनी का प्रतिनिधि या ग्लोबल टेक्निकल सपोर्ट कर्मचारी बताकर पीड़ित से बातचीत शुरू करते थे। पुलिस के अनुसार, विश्वास में लेने के बाद आरोपियों द्वारा UltraViewer जैसे रिमोट-एक्सेस सॉफ्टवेयर की मदद से पीड़ित के कंप्यूटर तक पहुंच हासिल की जाती थी।
फर्जी सिक्योरिटी स्कैन के नाम पर डराते थे
कथित साइबर ठगी का अगला चरण पीड़ित को डराने का था। पुलिस के मुताबिक, रिमोट एक्सेस मिलने के बाद आरोपी कंप्यूटर पर फर्जी सिक्योरिटी स्कैन दिखाते थे। इसके जरिए पीड़ित को बताया जाता था कि उसके सिस्टम से आपत्तिजनक या गैरकानूनी गतिविधियों के सबूत मिले हैं।
आरोपियों द्वारा कथित तौर पर पोर्नोग्राफी वेबसाइट, चाइल्ड पोर्नोग्राफी या ड्रग स्मगलिंग जैसी गंभीर गतिविधियों से कंप्यूटर के जुड़े होने का डर पैदा किया जाता था। इस तरह पीड़ित को घबराहट में डालकर उसकी निजी जानकारी और दूसरे जरूरी विवरण हासिल किए जाते थे।
पुलिस के मुताबिक, एजेंट द्वारा जुटाई गई जानकारी आगे वेरिफायर टीम को दी जाती थी। वेरिफायर टीम दोबारा पीड़ित से संपर्क कर उसकी जानकारी की पुष्टि करती थी और इसके बाद मामला क्लोजर टीम के पास पहुंचाया जाता था।
सरकारी अधिकारी बनकर गिरफ्तारी का डर
कथित साइबर ठगी का सबसे अहम चरण क्लोजर टीम से जुड़ा बताया गया है। पुलिस के अनुसार, क्लोजर टीम के सदस्य खुद को अलग-अलग सरकारी विभागों के अधिकारी बताकर पीड़ित से बात करते थे। इसके बाद उसे गिरफ्तारी, कानूनी कार्रवाई और कथित अपराध के मामले में फंसने का डर दिखाया जाता था।
इसी दबाव के बीच पीड़ित से पैसे ट्रांसफर कराने की कोशिश की जाती थी। पुलिस के मुताबिक, ठगी की रकम गिफ्ट कार्ड, बैंक ट्रांसफर और क्रिप्टोकरेंसी समेत अलग-अलग माध्यमों से हासिल की जाती थी। इस पूरे सिस्टम में हर टीम की अलग भूमिका होने के कारण पीड़ित को यह एहसास कराया जाता था कि वह अलग-अलग अधिकारियों और विभागों के संपर्क में है, जबकि पुलिस की जांच के अनुसार पूरा मामला एक ही कॉल सेंटर से संचालित हो रहा था।
मुख्य आरोपी प्रियांशू फरार
पुलिस की प्रारंभिक पूछताछ के अनुसार, कॉल सेंटर का कथित मुख्य संचालक शिवा उर्फ प्रियांशू है, जो फिलहाल फरार बताया जा रहा है। उसकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस टीम गठित की गई है। पुलिस के मुताबिक, नेहल और आशीष कॉल सेंटर के संचालन और प्रबंधन में प्रमुख भूमिका निभाते थे। कर्मचारियों की एंट्री और उपस्थिति, नए लोगों की भर्ती और ट्रेनिंग जैसे काम भी इनके जिम्मे होने की बात सामने आई है। जांच में यह भी पता चला कि साइबर ठगी कॉल सेंटर में काम करने वाले कर्मचारियों को कथित तौर पर 18 हजार से 30 हजार रुपये प्रतिमाह तक वेतन दिया जाता था। पुलिस के अनुसार, कर्मचारियों के रहने और भोजन की व्यवस्था भी मुफ्त में की जाती थी।
36 लैपटॉप और 20 मोबाइल समेत बड़ा डिजिटल सेटअप बरामद
पुलिस ने कॉल सेंटर से बड़ी संख्या में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद किए हैं। बरामद सामान में 36 लैपटॉप, 20 माउस, 22 हेडफोन, 32 लैपटॉप चार्जर, 5 राउटर और 20 व्यक्तिगत मोबाइल फोन शामिल हैं। इन सभी डिजिटल उपकरणों और दस्तावेजों को पुलिस ने अपने कब्जे में लेकर तकनीकी और फॉरेंसिक जांच शुरू कर दी है। पुलिस का कहना है कि इन उपकरणों से कॉलिंग डेटा, संभावित पीड़ितों, साइबर ठगी के मॉड्यूल और पैसों के लेन-देन से जुड़े महत्वपूर्ण सुराग मिल सकते हैं। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने में जुटी हैं कि इस नेटवर्क से कितने लोग जुड़े थे और इसके जरिए अब तक कितने लोगों को निशाना बनाया गया।
16 आरोपियों से पूछताछ जारी
अलीगंज पुलिस द्वारा पकड़े गए 16 लोगों में अलग-अलग राज्यों के आरोपी शामिल हैं। पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार लोगों में गुजरात, पश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र और लखनऊ से जुड़े लोग हैं। इनमें मयंक चौहान, विवेक सिंह, आदित्य कुमार सिंह, शिल्पा चक्रवर्ती, रॉकी राना, आयुष्मान, हसनैन, विशाल, तसीना गाजी, विश्वजीत मंडल, रिहान उर्फ फरान, जेनिफर लामा, जोइतादास, सुहेब, नेहल कुमार और आशीष शामिल हैं। पुलिस के मुताबिक, सभी आरोपियों से पूछताछ की जा रही है। डिजिटल साक्ष्यों और पूछताछ के आधार पर नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका भी खंगाली जा रही है। पुलिस ने यह भी बताया कि आरोपी आशीष का एक आपराधिक इतिहास सामने आया है। उसके खिलाफ पश्चिम बंगाल में साइबर अपराध से संबंधित मामला दर्ज होने की जानकारी पुलिस रिकॉर्ड में सामने आई है।
साइबर नेटवर्क और पैसों के रास्ते की होगी जांच
कमिश्नरेट लखनऊ के मुताबिक, बरामद इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और कॉलिंग डेटा का विस्तृत विश्लेषण कराया जा रहा है। जांच का फोकस केवल कॉल सेंटर में मौजूद लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि कथित नेटवर्क से जुड़े अन्य सहयोगियों, वित्तीय लाभार्थियों और पैसों के लेन-देन में शामिल लोगों की पहचान पर भी है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कॉल सेंटर का नेटवर्क कहां तक फैला था और अमेरिकी नागरिकों से कथित तौर पर हासिल रकम किन खातों या माध्यमों तक पहुंचती थी।
पुलिस टीम को मिला पुरस्कार
इस कार्रवाई में थाना अलीगंज पुलिस और साइबर सेल की टीम शामिल रही। पुलिस कमिश्नरेट के अनुसार, कार्रवाई में शामिल पुलिस टीम को पुलिस उपायुक्त उत्तरी की ओर से 25 हजार रुपये का नकद पुरस्कार दिया गया है। वहीं कांस्टेबल विपिन कुमार वर्मा को उत्कृष्ट कार्य के लिए अलग से 5 हजार रुपये का पुरस्कार दिया गया। फिलहाल पुलिस की जांच जारी है और फरार बताए जा रहे मुख्य आरोपी शिवा उर्फ प्रियांशू की तलाश की जा रही है। पुलिस का कहना है कि डिजिटल साक्ष्यों की जांच पूरी होने के बाद साइबर ठगी के इस नेटवर्क से जुड़े और भी नाम सामने आ सकते हैं।

