नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक सड़क दुर्घटना से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान कड़ी नाराजगी जताई। मामला इसलिए गंभीर हो गया क्योंकि शिकायतकर्ता के मुताबिक जिस मोटरसाइकिल सवार पर आरोप था, उसे घटना के बाद मौके पर ही पकड़ लिया गया था और पुलिस के हवाले भी किया गया था। इसके बावजूद दर्ज की गई FIR में शुरुआत में आरोपी का नाम दर्ज नहीं किया गया और उसे ‘अज्ञात मोटरसाइकिल सवार’ बताया गया।
आरोपी सामने था तो FIR में ‘अज्ञात’ क्यों?
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने इसी बिंदु पर पुलिस से सवाल किया। कोर्ट के सामने सवाल था कि जब आरोपी को मौके पर ही पकड़ लिया गया था, तो FIR में उसका नाम क्यों नहीं लिखा गया? अदालत के आदेश के मुताबिक FIR संख्या 195/2026 में 19 अगस्त को अज्ञात मोटरसाइकिल सवार के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था, जबकि बाद में दाखिल हलफनामे में उस व्यक्ति का नाम तुषार, पुत्र प्रेमपाल, बताया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की इस कार्रवाई को लेकर स्पष्टीकरण मांगा है। अदालत ने यह भी पूछा कि FIR में नाम पहले खाली रखने और बाद में उसे जोड़ने की वजह क्या थी।
पुलिस पर भरोसे को लेकर कोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान पीठ ने पुलिस की जांच प्रक्रिया पर तीखी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि अगर मामलों को इस तरह से संभाला जाएगा तो आम लोगों का पुलिस पर भरोसा कैसे कायम रहेगा। कोर्ट ने यहां तक कहा कि यदि उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच इसी तरह चलती रही तो हर जांच में CBI को शामिल करने की जरूरत पड़ सकती है। इससे तो अच्छा है कि हम UP पुलिस को ही भंग कर दें।
पीठ की टिप्पणी थी कि अगर किसी मामले में तथ्यों को छिपाने या कार्रवाई को अलग तरीके से प्रस्तुत करने की स्थिति बनती है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी स्थिति लगातार जारी नहीं रह सकती।
अधिकारी को अगली सुनवाई में होना होगा पेश
मामले में बुलंदशहर के खुर्जा के सर्कल ऑफिसर शोभित कुमार की ओर से दाखिल हलफनामे पर भी सुप्रीम कोर्ट संतुष्ट नजर नहीं आया। अदालत ने उनके हलफनामे को प्रभावी जवाब नहीं माना और अधिकारी को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से पेश होकर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने अधिकारी को एक नया और विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का विकल्प भी दिया है। इसमें खास तौर पर यह स्पष्ट करना होगा कि आरोपी मौके पर पकड़े जाने के बावजूद FIR में उसे अज्ञात क्यों बताया गया और बाद में उसका नाम किस आधार पर जोड़ा गया।
अब अगली सुनवाई में पुलिस अधिकारी के जवाब पर सबकी नजर रहेगी। इस मामले ने FIR दर्ज करने की प्रक्रिया, पुलिस जांच की पारदर्शिता और शिकायतकर्ता के भरोसे से जुड़े कई अहम सवाल अदालत के सामने ला दिए हैं।

