मुरैना। कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जिन्हें पढ़ते हुए लगता है कि शायद यह किसी फिल्म की पटकथा है। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के गिरवर सिंह तोमर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक समय वह CRPF की वर्दी पहनकर देश की सेवा कर रहे थे। फिर एक मामूली सड़क हादसे के बाद नौकरी चली गई। जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया कि वह साधु बन गए और ‘गिरवर दास महाराज’ के नाम से पहचाने जाने लगे।
लेकिन एक चीज उन्होंने कभी नहीं छोड़ी – अपनी नौकरी वापस पाने और इंसाफ हासिल करने की जिद। करीब 26-27 साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार अदालत का फैसला उनके पक्ष में आया। उम्र 54 साल हो चुकी थी, बाल जटाओं में बदल चुके थे और चेहरे पर लंबी सफेद दाढ़ी थी। फिर एक दिन उन्होंने जटाएं कटवाईं, दाढ़ी हटाई और दोबारा CRPF की वर्दी पहन ली।
कटी जटाएं, फिर बदला पूरा रूप
26 अगस्त की सुबह छत्तीसगढ़ के बीजापुर पहुंचने के बाद गिरवर सिंह सीधे CRPF कैंप नहीं गए। उनका पहला पड़ाव एक नाई की दुकान था। वर्षों से साधु के रूप में रह रहे गिरवर सिंह ने वहीं अपने लंबे बाल कटवाए और सफेद दाढ़ी भी साफ करवाई। कुछ ही देर में उनकी शक्ल-सूरत पूरी तरह बदल चुकी थी। भगवा वस्त्रों की जगह वर्दी ने ले ली। सिर पर कैप, पैरों में चमकते जूते और कंधों पर जिम्मेदारी – सालों बाद ‘बाबा गिरवर दास’ फिर से गिरवर सिंह तोमर बन चुके थे। यह बदलाव महज बाहरी रूप बदलने की कहानी नहीं थी। इसके पीछे उनकी जिंदगी के करीब तीन दशक का संघर्ष छिपा था।
1991 में शुरू हुआ था CRPF का सफर
मुरैना जिले के छिछावली गांव के रहने वाले गिरवर सिंह तोमर ने 1991 में CRPF ज्वाइन की थी। बतौर सिपाही उनकी नौकरी चल रही थी। परिवार और भविष्य को लेकर जिंदगी सामान्य रफ्तार से आगे बढ़ रही थी। लेकिन असम में तैनाती के दौरान हुई एक छोटी-सी घटना ने सब कुछ बदल दिया। गिरवर सिंह के मुताबिक, वह बाजार से खाना देकर वापस लौट रहे थे। इसी दौरान बाजार के पास एक मोड़ पर उनकी गाड़ी एक साइकिल से छू गई। साइकिल सवार गिर गया और बाद में साइकिल टूटने की शिकायत सामने आई।
उन्होंने अधिकारियों को बताया कि उन्हें यह पता ही नहीं चला कि साइकिल कब और कैसे गिरी। हालांकि, मामले में विभागीय कार्रवाई शुरू हुई। मेडिकल और अनुशासनात्मक प्रक्रिया के बाद करीब नौ साल की सेवा पूरी कर चुके गिरवर सिंह को CRPF से बर्खास्त कर दिया गया। यहीं से उनकी जिंदगी ने दूसरा मोड़ लिया।
नौकरी गई तो अदालत पहुंचे, फिर बन गए साधु
नौकरी जाने के बाद गिरवर सिंह ने हार नहीं मानी। उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया और 1999 में हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की। कानूनी लड़ाई शुरू हो गई, लेकिन फैसला जल्दी नहीं आया। इसी दौरान उनका झुकाव आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ता गया। वह आश्रमों और अखाड़ों से जुड़े और धीरे-धीरे साधु जीवन अपना लिया। उनके बाल बढ़ते गए, जटाएं बन गईं और चेहरे पर दाढ़ी आ गई। वह गिरवर दास महाराज के नाम से पहचाने जाने लगे। लेकिन साधु बनने का मतलब यह नहीं था कि उन्होंने अपनी पुरानी पहचान और अधिकार की लड़ाई छोड़ दी थी। एक तरफ वह आश्रमों और मंदिरों में आध्यात्मिक जीवन जी रहे थे, तो दूसरी तरफ अदालतों में अपनी नौकरी और सम्मान वापस पाने के लिए संघर्ष कर रहे थे।
सहकर्मियों को मिला प्रमोशन, गिरिवर करते रहे तारीखों का इंतजार
गिरवर सिंह की लड़ाई जितनी लंबी थी, उतना ही मुश्किल था उसे जारी रखना। जिन लोगों के साथ उन्होंने CRPF में नौकरी शुरू की थी, उनमें कई आगे बढ़कर अधिकारी बन गए। किसी को प्रमोशन मिला, किसी ने रिटायरमेंट लिया, लेकिन गिरवर सिंह की जिंदगी अदालत की तारीखों के बीच अटकी रही। 2007 में हाई कोर्ट से उनके पक्ष में फैसला आया, लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। CRPF की ओर से आगे की कानूनी प्रक्रिया चली और उन्हें फिर इंतजार करना पड़ा। इस लंबे संघर्ष में उनकी उम्र बढ़ती गई। जिस उम्र में एक जवान अपने करियर के सबसे अहम पड़ाव पर होता है, उस उम्र में गिरवर सिंह अदालतों के चक्कर लगा रहे थे। उनकी वर्दी उनसे दूर थी, लेकिन उसे वापस पाने की उम्मीद उन्होंने अपने भीतर जिंदा रखी।
2025 के फैसले ने बदल दी जिंदगी
सालों के इंतजार के बाद 2025 में अदालत ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। उनकी बर्खास्तगी को अवैध माना गया और पुनर्नियुक्ति का आदेश दिया गया। इसके बाद वह दिन भी आया, जिसका इंतजार गिरवर सिंह ने अपनी जिंदगी के सबसे लंबे दौर में किया था। अदालत के आदेश के अनुपालन में CRPF में उनकी वापसी का रास्ता साफ हुआ। करीब ढाई दशक से ज्यादा समय बाद उन्होंने फिर उसी संगठन की वर्दी पहनी, जहां से कभी उन्हें बाहर कर दिया गया था।
बीजापुर मिली पोस्टिंग
गिरवर सिंह 25 अगस्त की रात मुरैना से ट्रेन में सवार हुए और अगले दिन सुबह छत्तीसगढ़ के बीजापुर पहुंचे। अब वह CRPF की 85वीं बटालियन के साथ ड्यूटी कर रहे हैं। हालांकि, उनकी नई पहचान के साथ एक पुरानी पहचान भी जुड़ी हुई है। कैंप में लोग उन्हें अब भी प्यार से ‘बाबा’ कहकर बुलाते हैं।
भगवा से वर्दी तक का सफर बना मिसाल
गिरवर सिंह की कहानी में नौकरी, बर्खास्तगी, अदालत, आध्यात्मिक जीवन और फिर वर्दी में वापसी सब कुछ है। लेकिन इस पूरी कहानी की सबसे मजबूत कड़ी है उनका लंबा इंतजार और हार न मानने का जज्बा। जिस वर्दी को उन्होंने अपनी जवानी में पहना था, उसे वापस हासिल करने के लिए उन्हें अपनी जिंदगी के कई दशक इंतजार करना पड़ा। इस दौरान उनका रूप बदल गया, उम्र बदल गई और जिंदगी की दिशा बदल गई, लेकिन अपने अधिकार को लेकर उनका संकल्प नहीं बदला।

