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अलीगंज अग्निकांड: सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, LDA उपाध्यक्ष को अवमानना नोटिस, SIT रिपोर्ट के साथ किया तलब

अलीगंज अग्निकांड: सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, LDA उपाध्यक्ष को अवमानना नोटिस, SIT रिपोर्ट के साथ किया तलब

लखनऊ के अलीगंज अग्निकांड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। न्यायालय ने LDA के उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार को अवमानना नोटिस जारी किया है और अगली सुनवाई में उन्हें व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया है। साथ ही, उन्हें विशेष जांच दल (SIT) की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत करने को भी कहा गया है। अदालत ने यह भी पूछा है कि पूर्व में दिए गए न्यायिक आदेशों का पालन न करने पर उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न की जाए।

पुराने आदेशों की अनदेखी पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि जिस इमारत में भीषण आग लगी थी, उसे वर्ष 2016 में ही अवैध निर्माण के आधार पर गिराने का आदेश जारी किया गया था। हालांकि, कुछ ही समय बाद उसी आदेश को तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए वापस ले लिया गया। इसके बाद वर्षों तक भवन के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई और अंततः जून 2026 में हुए अग्निकांड में 15 छात्रों की जान चली गई। सुप्रीम कोर्ट ने इस घटनाक्रम पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए संकेत दिया कि यदि समय रहते कार्रवाई की जाती, तो शायद इतना बड़ा हादसा टाला जा सकता था।

हादसे के बाद हुई कार्रवाई पर अदालत की नाराजगी
अदालत को बताया गया कि आग की घटना के बाद संबंधित भवन को ध्वस्त कर दिया गया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कार्रवाई दुर्घटना के बाद की गई, जबकि पहले से उपलब्ध तथ्यों के आधार पर समय रहते कदम उठाए जा सकते थे। न्यायालय ने अधिकारियों की जवाबदेही और प्रशासनिक लापरवाही पर भी सवाल खड़े किए।

मास्टर प्लान के उल्लंघन को बताया गंभीर मामला
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि संबंधित भवन में मास्टर प्लान और निर्धारित भूमि उपयोग नियमों का उल्लंघन हुआ था। इसके बावजूद जिम्मेदार एजेंसियों ने प्रभावी कार्रवाई नहीं की। अदालत ने कहा कि यह मामला केवल एक भवन तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरी नियोजन, भवन सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है।

देशभर के राज्यों को भी बनाया गया पक्षकार
न्यायालय ने याद दिलाया कि इससे पहले जारी आदेश में इस मामले का दायरा बढ़ाते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पक्षकार बनाया जा चुका है। अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देशभर में मास्टर प्लान, भवन निर्माण नियमों और सार्वजनिक सुरक्षा मानकों का प्रभावी ढंग से पालन हो।

अब अगली सुनवाई पर टिकी निगाहें
फिलहाल सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर है, जहां LDA उपाध्यक्ष को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर SIT की रिपोर्ट सौंपनी होगी। अदालत के अगले निर्देश इस मामले की दिशा तय कर सकते हैं। वहीं, यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही, अवैध निर्माणों पर कार्रवाई और शहरी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी एक अहम उदाहरण बनता जा रहा है।

घटनाक्रम: कैसे बढ़ा मामला, एक नज़र
इस पूरे मामले की शुरुआत 10 मई 2016 को हुई, जब संबंधित भवन को नियमों के उल्लंघन के आधार पर ध्वस्त करने का आदेश जारी किया गया। लेकिन 5 जुलाई 2016 को लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए अपना ही आदेश वापस ले लिया, जिसके बाद वर्षों तक भवन के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

22 जून 2026 को इसी भवन में भीषण आग लगने से 15 छात्रों की दर्दनाक मौत हो गई, जिसने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। हादसे के अगले ही दिन, 23 जून 2026 को मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया। इसके बाद 25 जुलाई 2026 को प्रशासन ने संबंधित भवन को ध्वस्त कर दिया। अब 6 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए LDA के उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार को अवमानना नोटिस जारी किया है और अगली सुनवाई में उन्हें व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर सीलबंद लिफाफे में SIT रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। यह घटनाक्रम इस बात की ओर इशारा करता है कि यदि शुरुआती आदेशों पर समय रहते अमल किया गया होता, तो शायद इतना बड़ा हादसा टाला जा सकता था।

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