कभी परिवार की जिम्मेदारियों ने एक युवा के सपनों पर ब्रेक लगा दिया था। पिता के निधन के बाद छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी संभालने के लिए सलमान खान को अपनी जिंदगी की दिशा बदलनी पड़ी। घर चलाने के लिए उन्होंने दिल्ली की सड़कों पर Uber कैब तक चलाई। लेकिन मुश्किलों के बीच भी सेना में भर्ती होने का सपना उनके मन में कहीं जिंदा रहा। आखिरकार उन्होंने दोबारा तैयारी शुरू की, भारतीय सेना में शामिल हुए और फिर रोइंग को अपना खेल बना लिया। आज वही सलमान खान एशियन गेम्स में भारत के लिए पदक जीत चुके हैं।
पिता की मौत के बाद बदल गई जिंदगी
उत्तर प्रदेश के अमेठी से आने वाले सलमान खान छह भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं। उनके पिता मोहम्मद कासिम खान ट्रक-बॉडी बनाने का काम करते थे। परिवार के लिए हालात तब बेहद मुश्किल हो गए, जब डेंगू की वजह से उनके पिता का निधन हो गया। उस समय सलमान महज 18 साल के थे।
पिता के जाने के बाद घर की जिम्मेदारियां अचानक उनके कंधों पर आ गईं। छोटे भाई-बहनों की देखभाल और परिवार का खर्च चलाना उनकी प्राथमिकता बन गया। सलमान भारतीय सेना में जाना चाहते थे, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें कुछ समय के लिए अपना सपना रोकने पर मजबूर कर दिया।
परिवार के लिए दिल्ली में चलाई Uber कैब
सलमान ने हालात से समझौता करने के बजाय काम करने का फैसला किया। परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी करने के लिए वह दिल्ली पहुंचे और Uber कैब चलाने लगे। दिनभर सड़कों पर गाड़ी चलाने के साथ वह परिवार के भविष्य को बेहतर बनाने की कोशिश करते रहे। इसी दौरान उनके भीतर सेना में शामिल होने की इच्छा फिर मजबूत हुई। उन्होंने कैब चलाने की जिम्मेदारी दूसरे ड्राइवर को सौंप दी और करीब चार महीने तक सेना में भर्ती की तैयारी की। मेहनत रंग लाई और उन्होंने शारीरिक परीक्षा के साथ लिखित परीक्षा भी पास कर ली।
2018 में सेना में हुए शामिल
25 सितंबर 2018 को सलमान खान पुणे स्थित बॉम्बे इंजीनियर ग्रुप में शामिल हुए। सेना में भर्ती होने के बाद उनकी जिंदगी में एक नया अध्याय शुरू हुआ। यहीं उन्हें पहली बार रोइंग जैसे खेल के बारे में करीब से जानने का मौका मिला। सलमान की शारीरिक क्षमता को देखते हुए उनके कोच सत्यवान, सतीश सिरात और प्रभात मिश्रा ने उन्हें रोइंग में हाथ आजमाने के लिए प्रोत्साहित किया। शुरुआत में सलमान इस खेल को लेकर असमंजस में थे, क्योंकि उन्होंने कभी रोइंग को अपना करियर बनाने के बारे में नहीं सोचा था। लेकिन उन्होंने चुनौती स्वीकार की।
पहली बड़ी सफलता ने बढ़ाया आत्मविश्वास
रोइंग में शुरुआत करने के बाद सलमान ने अपनी मेहनत जारी रखी। पहली इंटर-सेंटर रेगाटा में सिल्वर मेडल जीतने से उनका आत्मविश्वास बढ़ा। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अलग-अलग प्रतियोगिताओं में लगातार बेहतर प्रदर्शन करते गए। साल 2021 में उनका चयन CME पुणे स्थित आर्मी रोइंग नोड के लिए हुआ। यहां उनकी ट्रेनिंग और मजबूत हुई और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने की राह भी आगे बढ़ी।
एशियन गेम्स में भारत के लिए जीता ब्रॉन्ज
अब सलमान खान की मेहनत को एशियन गेम्स में बड़ी उपलब्धि मिली है। आइची-नागोया एशियन गेम्स 2026 में सलमान खान और सतनाम सिंह की जोड़ी ने पुरुषों के डबल स्कल्स इवेंट में ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। भारतीय जोड़ी ने फाइनल में 6:13.25 का समय दर्ज किया और तीसरे स्थान पर रही। चीन की जोड़ी ने गोल्ड, जबकि उज्बेकिस्तान के खिलाड़ियों ने सिल्वर मेडल जीता।
रेस के दौरान सलमान और सतनाम लगातार पदक की दौड़ में बने रहे। अंतिम 500 मीटर में भारतीय जोड़ी ने तीसरा स्थान हासिल किया और आखिरकार ब्रॉन्ज मेडल पर कब्जा जमा लिया। इस स्पर्धा में यह भारत का पहला पदक बताया गया है।
मुश्किलों से निकली सफलता की कहानी
सलमान खान की उपलब्धि सिर्फ एक खेल पदक की कहानी नहीं है। यह उस सफर की कहानी है, जिसमें एक बेटे ने पिता को खोने के बाद परिवार को संभाला, रोजी-रोटी के लिए कैब चलाई, फिर अपने पुराने सपने को दोबारा जिया और सेना में शामिल होकर खेल की दुनिया में अपनी पहचान बनाई।

