विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत और रूस के पुराने रिश्तों का जिक्र करते हुए कहा है कि दोनों देशों की दोस्ती केवल मौजूदा परिस्थितियों पर आधारित नहीं है। दिल्ली में म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए जयशंकर ने कहा कि ऐसे कई मौके आए जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को समर्थन मिल रहा था, लेकिन उस समय रूस भारत के साथ खड़ा दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि पिछले करीब सात दशकों में कई अहम अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर मॉस्को ने नई दिल्ली का समर्थन किया है।
कश्मीर से कारगिल तक रूस का भारत को समर्थन
जयशंकर के बयान में भारत-रूस संबंधों के उन अध्यायों की चर्चा हुई, जिनका असर भारतीय विदेश नीति पर लंबे समय तक रहा। इनमें कश्मीर विवाद, 1965 का भारत-पाक युद्ध, 1971 का बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और 1999 का कारगिल युद्ध प्रमुख हैं। भारत के लिए रूस का समर्थन केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि कई मौकों पर संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी मॉस्को ने नई दिल्ली के पक्ष में रुख अपनाया।
1957 में कश्मीर पर UN में लगाया वीटो
कश्मीर मुद्दे पर रूस के समर्थन का एक प्रमुख उदाहरण 1957 का है। उस समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कश्मीर को लेकर एक प्रस्ताव पेश किया गया था। इसमें क्षेत्र में अस्थायी संयुक्त राष्ट्र बल भेजने की संभावना पर विचार किया गया था। प्रस्ताव को सुरक्षा परिषद के कई सदस्यों का समर्थन मिला, लेकिन तत्कालीन सोवियत संघ ने वीटो का इस्तेमाल कर प्रस्ताव को रोक दिया। भारत के लिए यह कदम बेहद महत्वपूर्ण माना गया था और दोनों देशों के बीच रणनीतिक भरोसे की नींव को मजबूत करने वाले घटनाक्रमों में इसकी चर्चा होती रही है।
1965 के युद्ध के बाद ताशकंद समझौते में निभाई भूमिका
1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध के दौरान भी रूस ने महत्वपूर्ण कूटनीतिक भूमिका निभाई। युद्ध के बाद दोनों देशों को बातचीत की मेज पर लाने के लिए सोवियत संघ ने पहल की। इसी प्रयास का परिणाम 1966 में हुए ताशकंद समझौते के रूप में सामने आया। इस समझौते के जरिए भारत और पाकिस्तान ने युद्ध के बाद सामान्य स्थिति बहाल करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
1971 में भारत के साथ मजबूती से खड़ा रहा सोवियत संघ
1971 का बांग्लादेश युद्ध भारत-रूस संबंधों के इतिहास में सबसे अहम अध्यायों में गिना जाता है। युद्ध के दौरान अमेरिका और चीन पाकिस्तान के करीब थे। अमेरिका ने अपना युद्धपोत भी बंगाल की खाड़ी की दिशा में भेजा था। ऐसे समय में सोवियत संघ ने भारत का समर्थन किया। भारत और सोवियत संघ के बीच उसी वर्ष हुई मैत्री संधि ने दोनों देशों के संबंधों को रणनीतिक मजबूती दी। अमेरिकी नौसैनिक गतिविधियों के जवाब में सोवियत संघ द्वारा अपने युद्धपोत और पनडुब्बियां भेजे जाने की बात भी इस दौर से जुड़ी रही है।
कारगिल युद्ध में पाकिस्तान से LoC सम्मान करने को कहा
1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भी रूस ने भारत का समर्थन किया। मॉस्को ने पाकिस्तान से नियंत्रण रेखा यानी LoC का सम्मान करने और पीछे हटने की अपील की थी। इस दौरान रूस का रुख भारत के पक्ष में स्पष्ट माना गया।
यूक्रेन युद्ध पर भी भारत का रुख साफ
जयशंकर ने रूस-यूक्रेन युद्ध का जिक्र करते हुए कहा कि भारत लगातार बातचीत और कूटनीति के जरिए संघर्ष खत्म करने की वकालत करता रहा है। उन्होंने बताया कि भारत ने रूस और यूक्रेन दोनों के साथ संपर्क बनाए रखा है। भारत की बातचीत में ब्लैक सी में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही, खाद्यान्न और ऊर्जा निर्यात तथा महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले रोकने जैसे मुद्दे शामिल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पहले कह चुके हैं कि मौजूदा दौर युद्ध का नहीं, बातचीत और कूटनीति का होना चाहिए।
अमेरिका को लेकर भी जयशंकर ने दिया संकेत
जयशंकर के हालिया बयानों में अमेरिका की नीतियों को लेकर भी तल्ख टिप्पणी देखने को मिली है। 29 सितंबर को न्यूयॉर्क में उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान से आने वाला आतंकवाद भारत की प्रमुख चिंताओं में शामिल है और अगर अमेरिका इस चिंता को नहीं समझता, तो इसका असर दोनों देशों के संबंधों पर पड़ सकता है। इसके बाद 4 अक्टूबर को उन्होंने वैश्विक राजनीति में हो रहे बदलावों का जिक्र करते हुए अमेरिका की नीतियों और चीन के बढ़ते प्रभाव की ओर संकेत किया।
भारत-रूस रिश्ते क्यों अब भी अहम हैं?
जयशंकर के बयान का मूल संदेश यही है कि भारत-रूस संबंधों को केवल आज की वैश्विक परिस्थितियों के आधार पर नहीं देखा जा सकता। कश्मीर से लेकर 1965 के युद्ध, 1971 के बांग्लादेश युद्ध और कारगिल तक, कई महत्वपूर्ण पड़ावों पर रूस की भूमिका भारत की विदेश नीति के लिहाज से अहम रही है। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के चलते भारत आज भी रूस के साथ अपने रिश्तों को दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी के तौर पर देखता है।

