नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े महिला संगठन राष्ट्र सेविका समिति की प्रमुख वी. शांताकुमारी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों को लेकर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे प्रदर्शन देश में अस्थिरता का माहौल बनाने और सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने युवाओं और महिलाओं को कथित तौर पर भड़काने वाली विचारधाराओं पर भी चिंता जताई।
शांताकुमारी, जिन्हें शांताक्का के नाम से भी जाना जाता है, ने ये बातें 16 अक्टूबर को नागपुर में राष्ट्र सेविका समिति के वार्षिक विजयादशमी उत्सव और शस्त्रपूजन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहीं। उनके बयान के बाद जंतर-मंतर पर चल रहे विरोध प्रदर्शनों और युवाओं की भूमिका को लेकर चर्चा तेज हो सकती है।
‘दिमागी नक्सलवाद’ को बताया खतरनाक विचारधारा
अपने संबोधन में शांताकुमारी ने ‘दिमागी नक्सलवाद’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए इसे एक अदृश्य और नुकसानदायक वैचारिक तंत्र बताया। उनका कहना था कि इस तरह की विचारधारा नई पीढ़ी, खासकर जेन-जी के युवाओं को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि युवाओं और महिलाओं के मन में असंतोष पैदा कर उन्हें अपने उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है।
उन्होंने जंतर-मंतर पर लगातार हो रहे प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे आयोजनों को असंवैधानिक माना जाना चाहिए। उनके मुताबिक, देश में अराजकता फैलाने और सामाजिक स्थिरता को नुकसान पहुंचाने की कोशिशें चिंता का विषय हैं।
प्रदर्शनकारियों की मंशा पर भी उठाए सवाल
शांताकुमारी ने आरोप लगाया कि इन प्रदर्शनों के पीछे भारत में अस्थिरता पैदा करने और देश की सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने का उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के बजाय टकराव को बढ़ावा देते हैं।
हालांकि, ये टिप्पणियां शांताकुमारी के विचार और आरोप हैं। प्रदर्शनों की प्रकृति और उनके उद्देश्यों का आकलन संबंधित घटनाओं और तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।
पीएम मोदी भी कर चुके हैं ‘दिमागी नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में ‘दिमागी नक्सली’ शब्द का उल्लेख किया था। उन्होंने कहा था कि सशस्त्र नक्सलवाद के खिलाफ कार्रवाई के बावजूद ऐसी विचारधाराएं मौजूद रह सकती हैं, जो समाज और देश के लिए चुनौती बनें। शांताकुमारी का ताजा बयान इसी वैचारिक बहस के बीच आया है, जिसमें विरोध प्रदर्शनों, युवाओं की राजनीतिक भागीदारी और देश की सांस्कृतिक पहचान को लेकर अलग-अलग विचार सामने आ रहे हैं।

