सोने की कीमतों में इस साल अब तक काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। जनवरी में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना रिकॉर्ड ऊंचाई तक पहुंचा था। इसके बाद कीमतों में कुछ नरमी आई, हालांकि ऊंचे स्तरों पर कारोबार जारी रहा। सितंबर में अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर बदलती उम्मीदों, मजबूत डॉलर और महंगाई की चिंता के बीच सोने पर दबाव भी देखने को मिला। 22 सितंबर को स्पॉट गोल्ड करीब 4,325 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था, जो जनवरी के 5,594.82 डॉलर के शिखर से लगभग 22 फीसदी नीचे था।
इसी बीच चीन से सोने की खरीदारी को लेकर जो आंकड़े सामने आए हैं, उन्होंने वैश्विक बाजार का ध्यान खींचा है। चीन ने 2026 के शुरुआती आठ महीनों में 1,000 टन से ज्यादा सोना आयात किया है। फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी से अगस्त के बीच चीन ने सोने के आयात पर करीब 158.8 अरब डॉलर खर्च किए, जबकि पूरे 2025 में 886 टन सोने के आयात पर 96.5 अरब डॉलर खर्च हुए थे। यानी इस साल के पहले आठ महीनों में ही चीन की सोना खरीद पिछले पूरे साल के स्तर से काफी आगे निकल गई।
चीन में सोने की खरीद क्यों बढ़ी?
चीन में सोने की बढ़ती खरीद के पीछे सिर्फ आभूषणों की मांग नहीं है। ऊंची कीमतों के बावजूद वहां निवेश के लिए सोने की मांग मजबूत बनी हुई है। चीन के प्रॉपर्टी बाजार की कमजोरी, शेयर बाजार में अनिश्चितता और सरकारी बॉन्ड पर कम यील्ड जैसे कारणों ने कुछ निवेशकों को सोने की ओर आकर्षित किया है।
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, 2026 की पहली छमाही में चीन की कुल सोने की मांग 518 टन रही। यह पिछले साल की समान अवधि से 7 फीसदी कम थी, लेकिन पिछले 10 साल के औसत 476 टन से काफी ऊपर रही। खास बात यह रही कि चीन में निवेश के लिए सोने की मांग यानी बार और कॉइन की खरीद साल-दर-साल 31 फीसदी बढ़ी।
इससे पता चलता है कि चीन में सोने की मांग का स्वरूप बदल रहा है। ऊंची कीमतों की वजह से आभूषणों की मात्रा में कमी आई है, लेकिन निवेश के लिए सोने की मांग ने बाजार को काफी हद तक संभाला है।
चीन का केंद्रीय बैंक भी लगातार बढ़ा रहा है सोना
चीन की सरकारी खरीद भी इस कहानी का अहम हिस्सा है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, चीन के केंद्रीय बैंक पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना ने अगस्त में 20.2 टन सोना अपने भंडार में जोड़ा। यह अक्टूबर 2023 के बाद किसी एक महीने में उसकी सबसे बड़ी बढ़ोतरी थी।
अगस्त के अंत तक चीन का आधिकारिक स्वर्ण भंडार 2,387 टन पहुंच गया था। केंद्रीय बैंक लगातार 22वें महीने सोने के भंडार में बढ़ोतरी कर चुका था। केंद्रीय बैंकों की ऐसी खरीदारी को बाजार में महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इससे सोने की दीर्घकालिक मांग को समर्थन मिल सकता है।
जनवरी के रिकॉर्ड के बाद सोने में क्यों आई कमजोरी?
सोने की कीमतों को सिर्फ चीन की खरीदारी तय नहीं करती। अंतरराष्ट्रीय ब्याज दरें, अमेरिकी डॉलर, महंगाई, निवेशकों की धारणा और भू-राजनीतिक घटनाक्रम भी इसकी दिशा बदल सकते हैं। जनवरी में सोने ने रिकॉर्ड स्तर बनाया था, लेकिन इसके बाद बाजार में कई ऐसे कारक आए जिन्होंने कीमतों पर दबाव डाला। सितंबर में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख और मजबूत डॉलर ने सोने को दबाव में रखा।
जब ब्याज दरें ऊंची रहने की उम्मीद बढ़ती है तो बिना ब्याज देने वाली संपत्ति के रूप में सोने की आकर्षकता कुछ कम हो सकती है। इसके अलावा मध्य-पूर्व में तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने महंगाई की चिंता को बढ़ाया है। तेल महंगा होने पर वैश्विक महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे केंद्रीय बैंकों की ब्याज दर नीति पर भी असर पड़ता है।
भारत में क्या असर पड़ सकता है?
चीन की भारी खरीदारी का असर केवल चीन के बाजार तक सीमित नहीं रहता। दुनिया के बड़े बाजारों में सोने की मांग बढ़ने पर वैश्विक कीमतों को समर्थन मिल सकता है। इसका अप्रत्यक्ष असर भारत में भी देखने को मिल सकता है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ताओं में शामिल है। हालांकि, भारतीय बाजार में सोने की कीमत केवल अंतरराष्ट्रीय भाव से तय नहीं होती। डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति, आयात शुल्क, स्थानीय प्रीमियम या डिस्काउंट और घरेलू मांग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, अगस्त 2026 में भारत में घरेलू सोने की कीमत 1,58,854 रुपये प्रति 10 ग्राम तक पहुंची थी। सितंबर में इसमें कुछ गिरावट आई। वहीं ऊंची कीमतों के कारण आभूषणों की खरीद की मात्रा पर दबाव बना हुआ है।
भारत में 2026 की दूसरी तिमाही में सोने की मांग 131 टन रही, जो एक साल पहले की तुलना में 6 फीसदी कम थी। लेकिन ऊंची कीमतों की वजह से कुल खर्च 1.979 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। यानी भारतीय उपभोक्ता कम मात्रा में सोना खरीद रहे हैं, लेकिन उसकी कीमत अधिक होने के कारण कुल खर्च ऊंचा बना हुआ है।
चीन और भारत की तस्वीर में अंतर
दिलचस्प बात यह है कि चीन और भारत में सोने की मांग की कहानी इस समय कुछ अलग दिखाई देती है। भारत में महंगी कीमतों की वजह से आभूषणों की मात्रा पर दबाव है, जबकि निवेश की मांग अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है। चीन में भी आभूषणों की मांग कमजोर हुई है, लेकिन निवेश के लिए बार और कॉइन की खरीद में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यानी दोनों देशों में ऊंची कीमतों ने पारंपरिक आभूषण मांग को प्रभावित किया है, लेकिन निवेशक सोने को अभी भी अपनी संपत्ति के एक हिस्से के रूप में देख रहे हैं।
आगे क्या देखेगा बाजार?
अब सोने के बाजार के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि चीन की खरीदारी आने वाले महीनों में किस रफ्तार से जारी रहती है। अगर चीन की केंद्रीय बैंक और निजी निवेशकों की मांग मजबूत रहती है, तो वैश्विक बाजार में सोने की मांग को सहारा मिल सकता है।
हालांकि, सोने की कीमतों की अगली दिशा केवल चीन की खरीदारी से तय नहीं होगी। अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति, डॉलर की चाल, कच्चे तेल की कीमत, मध्य-पूर्व की स्थिति और वैश्विक निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता भी अहम भूमिका निभाएगी।
इसलिए फिलहाल तस्वीर दो हिस्सों में बंटी हुई है। एक तरफ रिकॉर्ड ऊंचाई से सोना काफी नीचे आ चुका है और ऊंची ब्याज दरों का दबाव है, वहीं दूसरी तरफ चीन की भारी खरीद और केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीदारी बाजार में लंबी अवधि की मांग को मजबूत बनाए हुए है। आने वाले महीनों में यही देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या चीन की यह खरीदारी जारी रहती है और क्या इससे सोने की वैश्विक कीमतों को दोबारा मजबूती मिलती है।

