• info@thevaarta.com

भारत में कपास का रकबा सबसे ज्यादा, फिर भी उत्पादन में पीछे क्यों? अवैध बीज से लेकर कम पैदावार तक क्या है पूरा सच जान लीजिए

भारत में कपास का रकबा सबसे ज्यादा, फिर भी उत्पादन में पीछे क्यों? अवैध बीज से लेकर कम पैदावार तक क्या है पूरा सच जान लीजिए

भारत की अर्थव्यवस्था में कपड़ा उद्योग की भूमिका काफी अहम है। यह सेक्टर करोड़ों लोगों को रोजगार देता है और देश के निर्यात में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन इस पूरे उद्योग की बुनियाद जिस फसल पर टिकी है, वही कपास अब चिंता का विषय बनती जा रही है। हैरानी की बात यह है कि दुनिया में कपास की खेती के कुल रकबे का बड़ा हिस्सा भारत में होने के बावजूद उत्पादन के मामले में देश उतना आगे नहीं है।

फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) के अनुसार, दुनिया में कपास की खेती के कुल क्षेत्रफल का करीब 37 फीसदी हिस्सा भारत में है, लेकिन वैश्विक कपास उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी लगभग 20 फीसदी ही है। संगठन का मानना है कि इसका एक बड़ा कारण खेतों में इस्तेमाल होने वाले बीजों की गुणवत्ता और उत्पादकता से जुड़ी चुनौतियां हैं।

कपास का रकबा बड़ा, लेकिन पैदावार क्यों कम?
FSII के चेयरमैन अजय राणा के मुताबिक भारत के पास कपास की खेती के लिए दुनिया के मुकाबले काफी बड़ा क्षेत्र है, लेकिन प्रति हेक्टेयर उत्पादन अपेक्षाकृत कम है। यही अंतर भारत को वैश्विक स्तर पर उत्पादन क्षमता के मामले में पीछे करता है।

अगर अलग-अलग देशों की उत्पादकता पर नजर डालें तो तस्वीर और साफ होती है। ऑस्ट्रेलिया में एक हेक्टेयर से करीब 2,000 लिंट किलोग्राम कपास उत्पादन बताया गया है। वहीं चीन में यह आंकड़ा लगभग 1,400 लिंट किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। पाकिस्तान में भी प्रति हेक्टेयर करीब 600 लिंट किलोग्राम उत्पादन बताया गया है, जबकि भारत में यह आंकड़ा लगभग 435 लिंट किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। यानी भारत में कपास का क्षेत्रफल बड़ा होने के बावजूद प्रति हेक्टेयर उपज कई प्रमुख कपास उत्पादक देशों से कम है।

महाराष्ट्र में सामने आया अवैध HTBT कपास का मामला
कपास उत्पादन से जुड़ी एक अन्य चुनौती खेतों में ऐसे बीजों के इस्तेमाल की है, जिन्हें भारत में नियामकीय मंजूरी हासिल नहीं है। साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर ने FSII और नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ इंडिया के साथ मिलकर इस विषय पर एक अध्ययन किया है।

अध्ययन के अनुसार, खरीफ 2025-26 के दौरान देश में करीब 65 से 72 लाख एकड़ क्षेत्र में हर्बिसाइड टॉलरेंट बीटी यानी HTBT कपास की खेती किए जाने का अनुमान है। यह देश के कुल कपास क्षेत्र का लगभग 24 से 30 फीसदी हिस्सा बताया गया है। रिपोर्ट में ऐसे बीजों के अनधिकृत कारोबार का अनुमान करीब 1,500 करोड़ रुपये लगाया गया है।

महाराष्ट्र इस तरह के बीजों के इस्तेमाल के मामले में प्रमुख राज्यों में बताया गया है। इसके अलावा तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी किसानों के इनके इस्तेमाल की बात अध्ययन में सामने आई है।

आखिर किसान इन बीजों की ओर क्यों जा रहे हैं?
यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है कि जब इन बीजों को नियामकीय मंजूरी नहीं मिली है तो किसान इनका इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं। इसके पीछे खेती की बढ़ती लागत और मजदूरों की कमी को प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है।

इंडियन सोसाइटी फॉर कॉटन इम्प्रूवमेंट और साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर से जुड़े डॉ. सी.डी. मायी के अनुसार, खेतों में खरपतवार हटाने के लिए मजदूरों पर होने वाला खर्च किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

बताया गया है कि HTBT कपास में किसान खरपतवार नियंत्रण के लिए ग्लाइफोसेट का इस्तेमाल करते हैं। इसके जरिए एक या दो बार छिड़काव में खरपतवार को नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है। इस प्रक्रिया का खर्च लगभग 750 से 850 रुपये प्रति एकड़ तक बताया गया है।

इसके मुकाबले यदि मजदूरों से खरपतवार की सफाई कराई जाए तो यह खर्च बढ़कर करीब 12,000 से 15,000 रुपये प्रति एकड़ तक पहुंच सकता है। ऐसे में कम लागत और आसान खरपतवार नियंत्रण किसानों को इन बीजों की तरफ आकर्षित कर रहा है।

अनियंत्रित इस्तेमाल से क्या खतरा?
विशेषज्ञों का कहना है कि बिना नियामकीय मंजूरी वाले जीन और ग्लाइफोसेट के अनियंत्रित इस्तेमाल से लंबे समय में कई तरह की चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। इनमें कीटों और खरपतवारों में प्रतिरोध क्षमता बढ़ने का खतरा भी शामिल है। इसका असर आगे चलकर कपास की उत्पादकता पर पड़ सकता है।

यानी मौजूदा समस्या सिर्फ बीज के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध खेती की लागत, श्रम की उपलब्धता, खरपतवार नियंत्रण और भविष्य की उत्पादकता से भी जुड़ा हुआ है।

समाधान के तौर पर क्या सुझाव दिया गया?
FSII की ओर से सरकार से BGII-RRF cotton बीजों को मंजूरी देने की मांग की गई है। संगठन का कहना है कि इससे किसानों को प्रमाणित स्रोतों से बेहतर बीज उपलब्ध कराने की दिशा में मदद मिल सकती है और फसल प्रबंधन को भी नियामकीय ढांचे के तहत लाया जा सकता है।

इसके साथ ही ग्लाइफोसेट के लेबल क्लेम का विस्तार करने और नियंत्रित परिस्थितियों में इसके इस्तेमाल की अनुमति तथा निगरानी व्यवस्था पर भी जोर दिया गया है।

अध्ययन में कपास के खेतों में एकीकृत खरपतवार प्रबंधन अपनाने की सिफारिश की गई है। इसमें अलग-अलग हर्बिसाइड का उचित रोटेशन, विभिन्न तकनीकों का संयोजन और फसल उगने के शुरुआती 25 से 30 दिनों के भीतर सीमित छिड़काव जैसे उपाय शामिल हैं।

कुल मिलाकर, भारत के सामने चुनौती कपास का रकबा बढ़ाने की नहीं, उसी जमीन से ज्यादा और बेहतर उत्पादन हासिल करने की है। बेहतर बीज, वैज्ञानिक खेती, नियंत्रित खरपतवार प्रबंधन और किसानों की लागत कम करने वाली तकनीकें इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

Related Articles

Leave a Reply