अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति ने कुछ महीने पहले पूरी दुनिया के कारोबारियों की चिंता बढ़ा दी थी। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 50 फीसदी तक टैरिफ लगाकर भारतीय निर्यातकों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी। इसके बाद ट्रंप की ओर से 100 और 200 फीसदी तक टैरिफ लगाने की धमकियां भी सामने आने लगीं। ऐसा लग रहा था कि दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक अमेरिका के साथ व्यापार करना भारतीय कंपनियों के लिए मुश्किल हो जाएगा। लेकिन भारत ने इस चुनौती को कमजोरी नहीं बनने दिया। सरकार ने एक ऐसे रास्ते पर काम शुरू किया, जिसका असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था और निर्यात के लिए नए अवसरों के रूप में दिखाई दे सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि जिस समय अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव बढ़ रहा था, उसी दौरान भारत ने दुनिया के दूसरे बड़े बाजारों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश तेज कर दी। यूरोप से लेकर खाड़ी देशों और एशिया तक भारत ने व्यापारिक साझेदारी का दायरा बढ़ाया। अब अमेरिकी राजनीति में ट्रंप को मिले चुनावी झटके के बीच भारत की यह रणनीति और महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में भारतीय निर्यातकों को इसका फायदा मिल सकता है।
अमेरिका पर निर्भरता घटाने के लिए भारत ने खोले नए बाजार
भारत की व्यापारिक रणनीति का सबसे बड़ा हिस्सा नए देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते यानी FTA और आर्थिक साझेदारी को मजबूत करना रहा है। इसका सीधा फायदा यह है कि भारतीय उत्पादों को दूसरे देशों में कम या शून्य आयात शुल्क पर पहुंचने का अवसर मिलता है। इससे भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी कीमतों पर अपने उत्पाद बेच सकती हैं।
यूरोपीय संघ के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौता इस दिशा में सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जा रहा है। इसके जरिए भारतीय कारोबारियों के लिए यूरोप के 27 देशों में बाजार के नए अवसर खुल सकते हैं। कपड़ा, चमड़ा, जूते, इंजीनियरिंग उत्पाद, रत्न और आभूषण जैसे क्षेत्रों को इससे खास फायदा मिलने की उम्मीद है। यानी अमेरिका के बाजार में मुश्किलें बढ़ने पर भारत के पास अब कारोबार के लिए दूसरे बड़े विकल्प भी मौजूद हैं।
UAE से ऑस्ट्रेलिया तक भारतीय कारोबारियों के लिए बड़े मौके
भारत और संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE के बीच व्यापारिक समझौते ने भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत दी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, भारत के करीब 99 फीसदी उत्पादों को UAE में शुल्क मुक्त बाजार पहुंच मिल चुकी है। भारत का लक्ष्य अगले सात वर्षों में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को 200 अरब डॉलर तक पहुंचाना है। फिलहाल भारत का UAE को निर्यात करीब 38 अरब डॉलर के आसपास बताया गया है। ऐसे में इस बाजार में विकास की काफी संभावनाएं मौजूद हैं।
ऑस्ट्रेलिया भी भारतीय कारोबार के लिए महत्वपूर्ण साझेदार बनकर उभरा है। दोनों देशों के बीच हुए समझौते के तहत भारतीय उत्पादों को शून्य शुल्क पर बाजार में पहुंच मिलती है। भारत का ऑस्ट्रेलिया को निर्यात करीब 7.28 अरब डॉलर है और इसे तीन गुना करने का लक्ष्य रखा गया है।
वहीं स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लिकटेंस्टीन के साथ भारत का TEPA समझौता निवेश और रोजगार के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस समझौते के तहत अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता और करीब 10 लाख रोजगार के अवसरों की संभावना जताई गई है।
ब्रिटेन और ओमान के साथ समझौते से निर्यात को मिलेगी रफ्तार
भारत ने खाड़ी देशों और यूरोपीय बाजारों में अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए भी कई अहम कदम उठाए हैं। ओमान के साथ जून 2026 में लागू हुए व्यापार समझौते के तहत करीब 98.08 फीसदी टैरिफ लाइनों पर भारतीय उत्पादों को शून्य शुल्क का लाभ मिलने की बात कही गई है। वित्त वर्ष 2026 में ओमान को भारत का निर्यात करीब 4.02 अरब डॉलर रहा और इसे दोगुना करने का लक्ष्य है।
ब्रिटेन के साथ जुलाई 2026 में लागू हुए मुक्त व्यापार समझौते से भारतीय निर्यात के लगभग 99 फीसदी हिस्से को शुल्क मुक्त बाजार पहुंच मिलने का दावा किया गया है। वित्त वर्ष 2026 में ब्रिटेन को भारत का निर्यात करीब 13.44 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।
न्यूजीलैंड के साथ अक्टूबर 2026 में लागू हुए समझौते के तहत भी भारत के निर्यात पर शून्य शुल्क का प्रावधान बताया गया है। इसके साथ 20 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 7 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
पुराने व्यापारिक रिश्ते भी बन रहे भारत की ताकत
भारत की रणनीति सिर्फ नए देशों के साथ समझौते करने तक सीमित नहीं है। ASEAN देशों, जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, नेपाल, श्रीलंका, मलेशिया और थाईलैंड जैसे देशों के साथ पहले से मौजूद व्यापारिक संबंधों को भी मजबूत किया जा रहा है।
इन बाजारों में भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास हो रहे हैं। इससे भारत के निर्यात को नए ग्राहक मिल रहे हैं और घरेलू कंपनियों को अमेरिकी बाजार पर पूरी तरह निर्भर रहने की जरूरत भी कम हो सकती है।
ट्रंप की चुनावी मुश्किलें भारत के लिए क्यों हो सकती हैं फायदेमंद?
अब इस पूरी कहानी में अमेरिका की घरेलू राजनीति भी अहम भूमिका निभा रही है। मिडटर्म चुनावों में ट्रंप को मिले झटके के बाद उनकी नीतियों और फैसलों पर राजनीतिक दबाव बढ़ने की संभावना है। इसका असर उनकी टैरिफ नीति पर भी पड़ सकता है।
एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर एक्ट के तहत टैरिफ लगाने की शक्तियों का इस्तेमाल आसान नहीं रह सकता। ऐसी स्थिति में सेक्शन 301 और सेक्शन 232 जैसे दूसरे कानूनी रास्ते मौजूद हैं, लेकिन इनकी प्रक्रिया अपेक्षाकृत लंबी हो सकती है।
वहीं एमसी ग्लोबल सिक्योरिटीज के विश्लेषण में ट्रंप को मिले चुनावी झटके के बाद डॉलर, कच्चे तेल और रुपये की चाल में संभावित बदलाव को भारत के लिए सकारात्मक माना गया है। अगर डॉलर कमजोर होता है और तेल की कीमतों में नरमी आती है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था को राहत मिल सकती है। इससे आयात लागत घटने और निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति बेहतर होने की संभावना है।
भारत के लिए असली परीक्षा अब शुरू होगी
भारत ने पिछले कुछ समय में जिस तरह नए व्यापारिक साझेदार बनाए हैं, उससे साफ है कि देश अब वैश्विक कारोबार में अपने विकल्प बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। लेकिन सिर्फ समझौते कर लेना पर्याप्त नहीं होगा। भारतीय कंपनियों को गुणवत्ता, उत्पादन क्षमता, समय पर डिलीवरी और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर भी खरा उतरना होगा। अगर सरकार और उद्योग जगत इन अवसरों का सही इस्तेमाल कर पाए, तो आने वाले वर्षों में भारतीय निर्यात को नई ऊंचाई मिल सकती है।

