उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से गठबंधन की बिसात बिछने लगी है। इसी बीच राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी (RSSP) के अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य की कांग्रेस नेताओं राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से मुलाकात ने यूपी की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। मौर्य ने मुलाकात के बाद साफ किया कि कांग्रेस में उनकी पार्टी के विलय को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई है। चर्चा का केंद्र केवल इतना था कि आगामी विधानसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ विपक्षी दल किस तरह साथ आ सकते हैं।
हालांकि, कांग्रेस की ओर से स्वामी प्रसाद मौर्य की पार्टी को इंडिया गठबंधन में शामिल करने को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में मौर्य के दावे के बाद भी गठबंधन में उनकी एंट्री को लेकर तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं हुई है।
राहुल और प्रियंका से मुलाकात के बाद क्या बोले मौर्य?
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से मुलाकात के बाद स्वामी प्रसाद मौर्य ने विपक्षी एकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में बीजेपी को चुनौती देने के लिए विपक्षी दलों का एक मंच पर आना जरूरी है।
मौर्य ने केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने बेरोजगारी, सरकारी नौकरियों, आरक्षण, महंगाई और शिक्षा जैसे मुद्दों को लेकर सरकार पर निशाना साधा। उनका कहना था कि दलित, पिछड़े और आदिवासी वर्गों से जुड़े मुद्दों को लेकर विपक्ष को मजबूती से अपनी बात रखनी चाहिए।
उन्होंने सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक संपत्तियों को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। मौर्य का दावा है कि सरकारी स्कूलों की संख्या कम हुई है और शिक्षा आम लोगों के लिए महंगी होती जा रही है। उन्होंने एयरपोर्ट, बंदरगाह, रेलवे और एलआईसी जैसे संस्थानों के निजीकरण को लेकर भी सरकार को घेरा।
कांग्रेस के साथ गठबंधन पर अभी सस्पेंस क्यों?
स्वामी प्रसाद मौर्य भले ही कांग्रेस के साथ गठबंधन की संभावना की बात कर रहे हों, लेकिन कांग्रेस की तरफ से अभी तक इसे लेकर कोई स्पष्ट आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। यूपी कांग्रेस की नई प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा ने भी संकेत दिया कि किसी नेता का किसी दूसरे दल के नेताओं से मिलना अपने आप में गठबंधन की घोषणा नहीं माना जा सकता।
उन्होंने कहा कि गठबंधन में कौन शामिल होगा और सीटों का बंटवारा किस तरह होगा, इसका फैसला सभी सहयोगी दलों के नेताओं की बातचीत के बाद ही किया जाएगा। यानी मौर्य की राहुल-प्रियंका से मुलाकात के बाद सियासी हलचल जरूर बढ़ी है, लेकिन गठबंधन की अंतिम तस्वीर अभी बाकी है।
अखिलेश यादव पर मौर्य के तेवर क्यों चर्चा में?
इस पूरे घटनाक्रम में एक और पहलू खास है। स्वामी प्रसाद मौर्य कांग्रेस के साथ संभावित गठबंधन की बात कर रहे हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी और उसके अध्यक्ष अखिलेश यादव को लेकर उनके तेवर लगातार आक्रामक रहे हैं।
मौर्य 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हुए थे। चुनाव के बाद उन्होंने सपा से भी दूरी बना ली और अपनी अलग पार्टी का गठन किया। इसके बाद से ही अखिलेश यादव और सपा की राजनीतिक रणनीति को लेकर मौर्य कई बार सवाल उठाते रहे हैं।
अब जब कांग्रेस और सपा दोनों ही विपक्षी गठबंधन की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर मौर्य की पार्टी गठबंधन का हिस्सा बनती है तो सीटों का समीकरण किस तरह तैयार होगा।
सीट शेयरिंग पर क्या बोले स्वामी प्रसाद?
गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर पूछे गए सवाल पर स्वामी प्रसाद मौर्य ने इसे शुरुआती दौर की बातचीत बताया। उनका कहना था कि यह पहली बैठक थी और पहली मुलाकात में सीटों की संख्या जैसे सभी मुद्दे तय नहीं हो सकते।
उन्होंने संकेत दिया कि आगे पार्टी के भीतर चर्चा के साथ-साथ इंडिया गठबंधन में शामिल दलों के नेताओं के साथ भी बातचीत की जाएगी। यानी अभी सीटों का गणित शुरुआती चरण में है और आने वाले समय में इस पर कई दौर की बातचीत हो सकती है।
अपने बेटे को चुनाव मैदान में उतारने के सवाल पर भी मौर्य ने कहा कि बैठक किसी व्यक्तिगत राजनीतिक भविष्य को लेकर नहीं थी। उनके मुताबिक बातचीत का मुख्य मुद्दा विपक्षी गठबंधन था।
बिजनौर रैली विवाद पर भी सरकार को घेरा
मुलाकात के दौरान मौर्य ने बिजनौर में उनकी प्रस्तावित रैली रोके जाने का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि रैली की अनुमति के लिए पहले ही आवेदन किया गया था, लेकिन कार्यक्रम से ठीक पहले इसे रद्द कर दिया गया।
मौर्य के मुताबिक इससे पार्टी और कार्यकर्ताओं को आर्थिक नुकसान हुआ। उन्होंने दावा किया कि दूसरे जिलों में उनकी सभाएं शांतिपूर्वक हुई थीं, लेकिन बिजनौर में कार्यक्रम रोका जाना राजनीतिक दबाव का नतीजा है। उन्होंने इस मामले में हाईकोर्ट जाने की बात भी कही।
PDA पर अखिलेश के बयान को लेकर भी तंज
स्वामी प्रसाद मौर्य ने समाजवादी पार्टी के PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को लेकर भी अखिलेश यादव पर निशाना साधा। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जब किसी नेता की अपनी परिभाषा स्पष्ट नहीं होती तो अलग-अलग मंचों पर उसके अर्थ बदलते रहते हैं।
मौर्य का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यूपी की राजनीति में PDA को सपा की प्रमुख चुनावी रणनीति के तौर पर देखा जाता रहा है। ऐसे में मौर्य की टिप्पणी विपक्षी खेमे के भीतर चल रही राजनीतिक खींचतान को भी सामने लाती है।
आखिर राजनीतिक दल स्वामी प्रसाद मौर्य से क्यों बनाते हैं दूरी?
स्वामी प्रसाद मौर्य का राजनीतिक सफर कई बड़े दलों से होकर गुजरा है। वह लंबे समय तक बहुजन समाज पार्टी से जुड़े रहे और मायावती के करीबी नेताओं में उनकी गिनती होती थी। इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने बीजेपी का रुख किया और योगी आदित्यनाथ की पहली सरकार में मंत्री बने।
2022 के चुनाव से पहले मौर्य बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हुए। हालांकि बाद में सपा से भी उनका राजनीतिक रास्ता अलग हो गया और उन्होंने अपनी पार्टी बना ली।
मौर्य की राजनीति की एक खास पहचान उनके बेबाक और विवादित बयानों को लेकर भी रही है। धर्म, धार्मिक ग्रंथों और जातिगत मुद्दों पर उनके कई बयानों को लेकर राजनीतिक विवाद खड़े हुए हैं। यही वजह है कि उनके साथ गठबंधन करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए सीटों की गणित के साथ राजनीतिक संदेश और संभावित विवादों का भी सवाल बन जाता है।
2027 में क्या बदलेगा यूपी का सियासी समीकरण?
स्वामी प्रसाद मौर्य की राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से मुलाकात ने फिलहाल यूपी की राजनीति में एक नया सवाल जरूर खड़ा कर दिया है। क्या RSSP आने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बनेगी, या यह केवल शुरुआती स्तर की राजनीतिक बातचीत तक सीमित रहेगी? फिलहाल कांग्रेस की ओर से कोई अंतिम फैसला सामने नहीं आया है। वहीं सपा के साथ सीट शेयरिंग और विपक्षी गठबंधन के भीतर संभावित नए सहयोगियों को लेकर भी कई सवाल बाकी हैं।

