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असम में अतिक्रमण विरोधी अभियान पर बांग्लादेश में नाराजगी, नाहिद इस्लाम ने भारत पर लगाए भेदभाव के आरोप

असम में अतिक्रमण विरोधी अभियान पर बांग्लादेश में नाराजगी, नाहिद इस्लाम ने भारत पर लगाए भेदभाव के आरोप

ढाका: असम में आरक्षित वन क्षेत्रों से अतिक्रमण हटाने के लिए चलाए गए अभियान को लेकर बांग्लादेश की राजनीति में भी प्रतिक्रिया सामने आई है। बांग्लादेश की नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) के नेता नाहिद इस्लाम ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए भारत पर बंगाली मुसलमानों के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाया है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस मामले पर ध्यान देने और हस्तक्षेप करने की अपील की है।

नाहिद इस्लाम बांग्लादेश की राजनीति में जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन के बाद उभरे प्रमुख नेताओं में शामिल हैं। उन्होंने असम में हालिया बेदखली अभियान को बंगाली मुसलमानों के कथित उत्पीड़न से जोड़ते हुए भारत की आलोचना की है। उनके बयान के बाद असम में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई एक बार फिर चर्चा में आ गई है।

असम में क्यों चलाया गया अतिक्रमण हटाने का अभियान?
यह मामला असम के नगांव जिले के आरक्षित वन क्षेत्रों से जुड़ा है। राज्य के वन विभाग और जिला प्रशासन ने जंगल की जमीन पर कथित अवैध कब्जे हटाने के लिए अभियान चलाया। इस दौरान लुटुमाई और बोरपानी आरक्षित वन क्षेत्रों में कार्रवाई की गई।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर जानकारी देते हुए बताया कि राज्य सरकार अतिक्रमण के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम कर रही है। इसी के तहत वन विभाग की टीम ने नगांव जिले के इन वन क्षेत्रों में 530 हेक्टेयर जमीन को कब्जे से मुक्त कराया।

सरकार का कहना है कि आरक्षित वन क्षेत्रों को अतिक्रमण से मुक्त कराना जरूरी है। वहीं, इस कार्रवाई से प्रभावित परिवारों और कुछ संगठनों ने बेदखली की प्रक्रिया तथा उसके सामाजिक प्रभावों को लेकर सवाल उठाए हैं।

एक हजार से ज्यादा परिवारों पर पड़ा असर
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अक्टूबर 2026 में असम के नगांव, होजाई और गोलाघाट जिलों में चलाए गए अभियान के दौरान बड़ी संख्या में परिवार प्रभावित हुए। रिपोर्टों में एक हजार से अधिक परिवारों के बेदखल होने की बात कही गई है। प्रभावित लोगों में बड़ी संख्या बंगाली मूल के मुसलमानों की बताई गई है।

कुछ स्थानीय निवासियों का दावा है कि उनके परिवार लंबे समय से इन इलाकों में रह रहे थे और कुछ परिवारों को पहले सरकारी स्तर पर बसाया गया था। दूसरी ओर, प्रशासन का कहना है कि आरक्षित वन भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया और संबंधित अदालती आदेशों के तहत की गई।

इस तरह मामले में एक ओर वन भूमि को कब्जे से मुक्त कराने का सरकारी पक्ष है, तो दूसरी ओर बेदखली से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और उनके अधिकारों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

भारत-बांग्लादेश संबंधों के बीच बढ़ी बयानबाजी
असम में हुई इस कार्रवाई पर नाहिद इस्लाम की प्रतिक्रिया ने मुद्दे को भारत और बांग्लादेश के राजनीतिक विमर्श से भी जोड़ दिया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि बंगाली मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव किया जा रहा है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस मामले में दखल देना चाहिए।

हालांकि, नाहिद इस्लाम के आरोपों को उनके राजनीतिक बयान के तौर पर देखा जाना चाहिए। इन आरोपों और असम सरकार के दावों का स्वतंत्र तथ्यों के आधार पर आकलन करना जरूरी है।

फिलहाल, असम में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के साथ ही प्रभावित परिवारों के अधिकार, पुनर्वास और वन भूमि के संरक्षण को लेकर बहस जारी है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर भारत और बांग्लादेश के राजनीतिक हलकों में चर्चा और तेज हो सकती है।

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