पितृ पक्ष को हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान परिवार अपने दिवंगत पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध जैसे कर्म करता है। धार्मिक मान्यता है कि इन दिनों पितरों का स्मरण और श्रद्धापूर्वक मंत्रों का जाप करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त हो
अगर आप भी पितृ पक्ष में अपने पितरों का स्मरण करना चाहते हैं, तो कुछ मंत्रों और स्तोत्रों का पाठ कर सकते हैं।
पितृ गायत्री मंत्र का करें जाप
पितृ पक्ष में पितरों को याद करते हुए इस मंत्र का जाप श्रद्धा के साथ किया जाता है। मान्यता है कि नियमित रूप से इसका पाठ करने से मन को शांति मिलती है और व्यक्ति अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करता है।
मंत्र –
ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः।।
पितृ स्तोत्र का पाठ
पितृ पक्ष के दौरान पितृ स्तोत्र का पाठ भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसमें पितरों के विभिन्न स्वरूपों और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनका स्मरण किया जाता है।
अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम्।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान्।।
मन्वादीनां च नेतार: सूर्याचन्दमसोस्तथा।
तान् नमस्यामहं सर्वान् पितृनप्युदधावपि।।
नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।
देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येहं कृताञ्जलि:।।
प्रजापते: कश्पाय सोमाय वरुणाय च।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।
नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे।।
सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्।।
अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम्।
अग्रीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत:।।
ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्रिमूर्तय:।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण:।।
तेभ्योखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतामनस:।
नमो नमो नमस्तेस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुज।।
इसी तरह स्तोत्र में देवर्षियों, सप्तर्षियों, प्रजापति और अन्य पितृगणों का स्मरण किया गया है। मान्यता के अनुसार पितृ पक्ष में इसका पाठ श्रद्धा और नियमपूर्वक करना शुभ माना जाता है।
अर्यमा देव का मंत्र भी करें स्मरण
हिंदू परंपरा में अर्यमा को पितरों से संबंधित देवता माना गया है। तर्पण के समय उनका स्मरण करने की परंपरा भी बताई जाती है।
मंत्र –
ॐ अर्यमा नः त्रिप्यताम् इदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नमः।
ॐ मृत्योर्मा अमृतं गमय॥
श्रद्धा सबसे महत्वपूर्ण
पितृ पक्ष में मंत्रों के साथ तर्पण और श्राद्ध कर्म अपनी पारिवारिक परंपरा और धार्मिक विधि के अनुसार करना चाहिए। धार्मिक मान्यता में सबसे महत्वपूर्ण भाव श्रद्धा, स्मरण और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का माना गया है। इसलिए मंत्रों का जाप करते समय मन को शांत रखकर पितरों का स्मरण करना शुभ माना जाता है।

